विकास का सच या भ्रम?
“अगर कोई विकसित हुआ है, तो वह अंबानी और डॉलर” - डॉ. राकेश दत्त मिश्र
आज देश में चारों ओर “विकास” का शोर है। सत्ता के मंचों से लेकर सरकारी विज्ञापनों तक, हर जगह यह दावा किया जा रहा है कि भारत तेजी से विकसित हो रहा है। चमचमाती सड़कों, बड़े-बड़े एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, विदेशी निवेश और डिजिटल इंडिया की तस्वीरें दिखाकर जनता को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया जा रहा है कि देश विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या यह विकास वास्तव में आम जनता के जीवन में सुख, सुरक्षा और सम्मान ला पाया है?
पिछले 12 वर्षों पर यदि निष्पक्ष दृष्टि डालें, तो स्पष्ट दिखाई देता है कि इस तथाकथित विकास का लाभ सीमित वर्ग तक ही सिमट कर रह गया है। देश की आम जनता आज भी महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाल व्यवस्था से त्रस्त है। गरीब और गरीब हुआ है, मध्यम वर्ग कर्ज में डूबा है, जबकि कुछ उद्योगपति लगातार दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में ऊपर चढ़ते गए।
ऐसा प्रतीत होता है कि यदि किसी का वास्तविक विकास हुआ है, तो वह केवल बड़े कॉरपोरेट घरानों और डॉलर का हुआ है।
महंगाई ने तोड़ी आम आदमी की कमर
आज रसोई गैस से लेकर दाल, तेल, सब्जी, पेट्रोल, डीजल, बिजली और दवाइयों तक हर वस्तु की कीमत आसमान छू रही है। एक समय था जब मध्यम वर्ग थोड़ी बचत कर भविष्य सुरक्षित करने का सपना देखता था, पर आज अधिकांश परिवार केवल महीने का खर्च चलाने की जद्दोजहद में लगे हैं।
गांवों में मजदूरों को काम नहीं मिल रहा, शहरों में युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा। पढ़े-लिखे डिग्रीधारी युवा छोटे-मोटे काम करने को विवश हैं। लाखों पद सरकारी विभागों में खाली पड़े हैं, पर भर्ती प्रक्रिया वर्षों तक लटकी रहती है।
क्या यही विकास है कि युवा डिग्री लेकर सड़कों पर घूमे और सत्ता केवल आंकड़ों का खेल खेलती रहे?
बेरोजगारी का भयावह संकट
देश का सबसे बड़ा संकट आज बेरोजगारी है। युवा वर्ग, जो किसी भी राष्ट्र की शक्ति होता है, आज निराशा और असुरक्षा में जी रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक हो रहे हैं, भर्ती परीक्षाएं रद्द हो रही हैं और नियुक्तियों में वर्षों की देरी हो रही है।
दूसरी ओर सरकार “स्टार्टअप” और “आत्मनिर्भरता” के बड़े-बड़े नारे देती है, लेकिन छोटे उद्योग, दुकानदार और पारंपरिक व्यापार लगातार बंद हो रहे हैं। जीएसटी और महंगी व्यवस्था ने छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी है।
देश का युवा पूछ रहा है -
“जब रोजगार ही नहीं, तो विकास किसका?”
कॉरपोरेट का स्वर्णकाल
पिछले कुछ वर्षों में देश की संपत्ति तेजी से कुछ बड़े उद्योगपतियों के हाथों में केंद्रित हुई है। सरकारी संस्थानों का निजीकरण हुआ, एयरपोर्ट, बंदरगाह, रेल, खदानें और बड़े प्रोजेक्ट निजी कंपनियों को सौंपे गए।
जनता यह महसूस करने लगी है कि सरकार और कॉरपोरेट के बीच की दूरी समाप्त हो चुकी है। आम नागरिक टैक्स भरता है, लेकिन सुविधाओं का लाभ बड़े उद्योगपतियों को मिलता है। बैंक का कर्ज किसान नहीं चुका पाए तो उसकी जमीन नीलाम हो जाती है, लेकिन हजारों करोड़ लेकर भागने वाले उद्योगपति विदेशों में सुरक्षित रहते हैं।
यही कारण है कि लोगों के मन में यह धारणा मजबूत हो रही है कि देश में विकास नहीं, बल्कि “कॉरपोरेट केंद्रीकरण” हुआ है।
विदेश यात्राएं और जमीनी हकीकत
देश के मुखिया की विदेश यात्राओं को बहुत बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बताया जाता है। निस्संदेह अंतरराष्ट्रीय संबंध किसी भी राष्ट्र के लिए आवश्यक हैं, परंतु जब देश के भीतर जनता महंगाई, बेरोजगारी, किसान संकट और सामाजिक असुरक्षा से जूझ रही हो, तब जनता यह प्रश्न पूछने का अधिकार रखती है कि इन यात्राओं से आम नागरिक को क्या मिला?
क्या विदेशों में भव्य स्वागत और बड़े-बड़े मंचों पर भाषण देने से गांव के किसान की आय बढ़ गई?
क्या बेरोजगार युवाओं को नौकरी मिल गई?
क्या गरीब का इलाज सस्ता हो गया?
क्या शिक्षा आम आदमी की पहुंच में आ गई?
यदि नहीं, तो जनता का सवाल स्वाभाविक है।
विकास का वास्तविक अर्थ क्या है?
विकास केवल ऊंची इमारतें, बड़े पुल और विदेशी निवेश नहीं होता।
वास्तविक विकास वह है -
- जब हर हाथ को काम मिले,
- जब किसान आत्महत्या न करे,
- जब युवा निराश न हो,
- जब गरीब इलाज के अभाव में न मरे,
- जब शिक्षा व्यापार न बने,
- जब महिलाएं सुरक्षित महसूस करें,
- और जब देश का नागरिक सम्मान और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सके।
यदि विकास के बावजूद जनता दुखी है, तो उस विकास की दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक है।
लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अपराध नहीं
आज जो भी सरकार से सवाल पूछता है, उसे विरोधी, राष्ट्रविरोधी या नकारात्मक सोच वाला कह दिया जाता है। लेकिन लोकतंत्र की आत्मा ही प्रश्न पूछने में है। सत्ता जनता से ऊपर नहीं होती। जनता टैक्स देती है, सरकार चुनती है और इसलिए जवाब मांगने का अधिकार भी रखती है।
देशभक्ति का अर्थ केवल सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में सच बोलना भी है। यदि जनता परेशान है तो उसकी आवाज उठाना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकतें है कि :-
देश आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां चमकदार प्रचार और जमीनी सच्चाई के बीच गहरी खाई दिखाई दे रही है। विकास का अर्थ केवल कुछ उद्योगपतियों की संपत्ति बढ़ना और विदेशी मंचों पर तालियां पाना नहीं हो सकता।
जब तक गांव का किसान, शहर का मजदूर, मध्यम वर्गीय परिवार और बेरोजगार युवा अपने जीवन में वास्तविक सुधार महसूस नहीं करेगा, तब तक विकास के दावे अधूरे रहेंगे।
आज आवश्यकता है ऐसे विकास मॉडल की, जिसमें देश का अंतिम व्यक्ति भी शामिल हो। अन्यथा इतिहास यही कहेगा कि पिछले वर्षों में यदि कोई सबसे अधिक विकसित हुआ, तो वह केवल बड़े कॉरपोरेट घराने और डॉलर थे - आम जनता नहीं।
- ✍️ डॉ. राकेश दत्त मिश्र
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