धमकी भरा ई-मेल से कोर्ट परिसर में हड़कंप, जांच एजेंसियां अलर्ट
धमकी भरा ई-मेल से कोर्ट परिसर में हड़कंप, जांच एजेंसियां अलर्ट

- लगातार धमकी भरे ई-मेल से कोर्ट परिसर में दहशत: क्या यह प्रशासनिक विफलता का संकेत?
पटना, 11 फरवरी 2026।
पटना स्थित कोर्ट परिसर को एक बार फिर बम धमाके की धमकी भरा ई-मेल मिलने से न्यायिक व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दोपहर 1 बजे “5 बम धमाके” होने की चेतावनी वाले इस ई-मेल ने न केवल न्यायिक कर्मियों और वकीलों में दहशत फैलाई, बल्कि आम जनता के बीच भी भय का माहौल बना दिया।
सूत्रों के अनुसार, यह पहला अवसर नहीं है जब इस प्रकार का धमकी भरा संदेश मिला हो। यदि लगातार इस तरह के ई-मेल भेजे जा रहे हैं, तो यह स्वाभाविक है कि प्रशासनिक तैयारियों और साइबर मॉनिटरिंग सिस्टम की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठें।

धमकी मिलते ही पुलिस, बम निरोधक दस्ता और डॉग स्क्वॉड को सक्रिय किया गया। कोर्ट परिसर की सघन जांच की गई और सुरक्षा घेरा मजबूत किया गया। साइबर सेल ई-मेल के स्रोत और आईपी एड्रेस की जांच में जुटी है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि पूर्व में भी ऐसे धमकी भरे मेल आ चुके हैं, तो अब तक दोषियों की पहचान और गिरफ्तारी क्यों नहीं हो पाई? क्या साइबर निगरानी तंत्र पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं है? क्या संवेदनशील संस्थानों के ई-मेल सर्वर पर्याप्त सुरक्षा से लैस हैं?
न्याय व्यवस्था पर मनोवैज्ञानिक दबाव
कोर्ट परिसर लोकतंत्र का एक संवेदनशील स्तंभ है। ऐसे में बार-बार धमकी भरे संदेश न केवल सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देते हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर भी मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते हैं। वकीलों और वादकारियों में असुरक्षा की भावना पैदा होना चिंताजनक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ऐसे मामलों में कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो यह प्रवृत्ति बढ़ सकती है। साइबर आतंक या दहशत फैलाने की कोशिशों को शुरुआती स्तर पर ही कुचलना जरूरी है।
प्रशासन से जवाबदेही की मांग
जनता और कानूनी समुदाय के बीच यह चर्चा तेज है कि:
- क्या संवेदनशील सरकारी ई-मेल आईडी की नियमित साइबर ऑडिट हो रही है?
- क्या धमकी भेजने वालों की पहचान कर कानूनी कार्रवाई की गई?
- क्या ऐसे मामलों के लिए विशेष टास्क फोर्स बनाई गई है?

यदि लगातार धमकी भरे मेल आ रहे हैं और कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ रहा, तो इसे प्रशासनिक चूक या विफलता के रूप में देखा जाना स्वाभाविक है।
सख्त कार्रवाई ही समाधान
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि ई-मेल ट्रैकिंग, डिजिटल फॉरेंसिक और अंतरराज्यीय समन्वय से ऐसे मामलों में शीघ्र सफलता मिल सकती है। जरूरत है त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई की, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति न्यायिक संस्थानों को निशाना बनाने की हिम्मत न कर सके।
निष्कर्ष:
कोर्ट परिसर को बार-बार मिल रही धमकियां केवल एक सुरक्षा मुद्दा नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्षमता की परीक्षा भी हैं। यदि समय रहते दोषियों की पहचान कर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह न केवल कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाएगा, बल्कि आम नागरिकों का विश्वास भी कमजोर करेगा।
प्रशासन को अब केवल जांच नहीं, बल्कि परिणाम भी दिखाने होंगे।
Divya Rashmi News Desk
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