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जब कोई मन को अच्छा लगने लगा,

जब कोई मन को अच्छा लगने लगा,

तन्हाइयों में साथ साथ चलने लगा।
चाहा कभी जब छोड़कर तन्हां रहूँ,
ख्वाब बनकर रात में वो ढलने लगा।
इश्क़ क्या है सोचता हूँ जब कभी,
ज़हन में नाम उसका मचलने लगा।
देख कर अनदेखा किया उसने मुझे,
अश्क आँखों से मेरी ढलने लगा।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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