ये कागज के फूल
अरुण दिव्यांशक्षण भर के कागजी सजावट ,
दिखे सुंदर ये कागज के फूल ।
गिर पड़े अगर बूॅंद भर पानी ,
बनकर रह जाता है वह धूल ।।
कागज का फूल हस्त कला है ,
इन फूलों में होता सुगंध कहाॅं ?
आजु बाजु सुगंध ये फैला दे ,
होता ऐसा यह अनुबंध कहाॅं ?
दिखने में ही सुंदर यह होता ,
भी़गने के बाद ऑंखों के शूल ।
गिर पड़े अगर बूॅंद भर पानी ,
बनकर रह जाता वह धूल ।।
न होता सुगंध न है कुलकुल ,
कागजी फूल है कागजी नाव ।
बच्चों के हाथों का खिलौना ,
होते इसमें क्षणभर के छाव ।।
कागजी फूल कागजी पुल ,
जलस्तर छूने से जाता घुल ।
गिर पड़े गर बूॅंद भर पानी ,
बनकर रह जाता वह धूल ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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