विज्ञान की शक्ति, संस्कृति का विवेक: वैश्विक प्रगति का महासंगम
सत्येन्द्र कुमार पाठक
दो धाराओं का मिलन आज का युग एक अनूठे संक्रमण का साक्षी है। एक ओर हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और क्वांटम कंप्यूटिंग के शिखर पर हैं, तो दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन और नैतिक शून्यता जैसी चुनौतियां हमारे द्वार पर खड़ी हैं। इस मोड़ पर यह स्पष्ट है कि मानवता का भविष्य केवल मशीनों के विकास में नहीं, बल्कि उन मानवीय मूल्यों में छिपा है जो हमारी संस्कृतियों ने सदियों से संजोए हैं। विज्ञान और संस्कृति, जिन्हें अक्सर अलग माना जाता है, वास्तव में एक ही वैश्विक रथ के दो पहिये है। तकनीक और परंपरा का संगम स्वास्थ्य के क्षेत्र में विज्ञान और संस्कृति का मेल सबसे अधिक स्पष्ट और कल्याणकारी दिखता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान (Allopathy) ने जहाँ जटिल शल्य चिकित्सा और जीवन रक्षक दवाओं में महारत हासिल की है, वहीं वैश्विक स्तर पर अब 'होलिस्टिक वेलनेस' (समग्र स्वास्थ्य) की मांग बढ़ी है ।योग और आयुर्वेद जैसी प्राचीन सांस्कृतिक पद्धतियों को आज वैश्विक वैज्ञानिक मान्यता मिल रही है। यह केवल व्यायाम नहीं, बल्कि एक 'सांस्कृतिक जीवनशैली' है जो मानसिक शांति और शारीरिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाती है। 'प्रिसिजन मेडिसिन' के इस दौर में जब हम जेनेटिक इंजीनियरिंग की बात करते हैं, तो हमारी संस्कृति हमें याद दिलाती है कि चिकित्सा का उद्देश्य केवल बीमारी को ठीक करना नहीं, बल्कि रोगी की गरिमा को बनाए रखना भी है। : तर्क और संस्कार का मिलन शिक्षा वह सेतु है जहाँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक मूल्य एक साथ मिलते हैं। 21वीं सदी की शिक्षा प्रणाली केवल 'कौशल' (Skills) नहीं, बल्कि 'चरित्र' निर्माण पर बल दे रही है। विश्व भर की नवीन शिक्षा नीतियों में अब 'अनुशासनात्मक सीमाओं' को तोड़ा जा रहा है। कोडिंग और रोबोटिक्स सीखने वाला छात्र यदि अपनी संस्कृति के इतिहास और दर्शन को भी पढ़ता है, तो वह एक संवेदनशील नागरिक बनता है। जब शिक्षा में 'तर्क' के साथ 'नैतिकता' जुड़ती है, तभी हम ऐसे नवाचारों की उम्मीद कर सकते हैं जो विनाश के बजाय विकास के लिए हों । असीम आकाश और हमारी जड़ें अंतरिक्ष विज्ञान आज राष्ट्रों की शक्ति का प्रतीक है, लेकिन इसकी प्रेरणा अक्सर हमारी सांस्कृतिक जिज्ञासा से आती है।
उदाहरण: भारत के 'चंद्रयान' और 'मंगलयान' जैसे अभियानों की सफलता केवल तकनीकी जीत नहीं थी, बल्कि यह उस प्राचीन भारतीय संस्कृति की भी जीत थी जिसने हजारों वर्षों से सितारों और नक्षत्रों का अध्ययन किया है। अंतरिक्ष अन्वेषण हमें सिखाता है कि ब्रह्मांड के विस्तार में पृथ्वी एक 'छोटा सा नीला बिंदु' है। यह वैज्ञानिक तथ्य हमारी सांस्कृतिक अवधारणा 'वसुधैव कुटुंबकम' (पूरी पृथ्वी एक परिवार है) को मजबूती प्रदान करता है, जिससे वैश्विक सहयोग की भावना बढ़ती है।
स्थिरता और समावेशी मार्गदर्शन विज्ञान हमें 'गति' दे सकता है, लेकिन 'दिशा' केवल संस्कृति ही दे सकती है। जब हम संस्कृति की बात करते हैं, तो इसका अर्थ वह विश्वदृष्टि है जो हमें एक-दूसरे से और प्रकृति से जोड़ती है।
पारिस्थितिक दर्शन: भारतीय संस्कृति और विश्व की कई स्वदेशी परंपराओं में प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक जीवित इकाई माना गया है। 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा' (त्याग के साथ भोग करो) जैसे सूत्र हमें सिखाते हैं कि प्रकृति का दोहन नहीं, पोषण आवश्यक है। यही वह 'पारिस्थितिक विषय' है जो आज के जलवायु संकट का सबसे प्रभावी समाधान है। वैश्वीकरण और उभरती वैज्ञानिक संस्कृति रोनाल्ड रॉबर्टसन जैसे समाजशास्त्रियों ने 'सांस्कृतिक वैश्वीकरण' की चर्चा की थी। आज वैज्ञानिक संस्कृति स्वयं एक वैश्विक भाषा बन गई है। एक आधुनिक वैज्ञानिक संस्कृति वह है जो बंद दरवाजों के पीछे काम नहीं करती। विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आने वाले शोधकर्ता विज्ञान में नए आयाम जोड़ते हैं। जैसा कि चुनफा वांग ने रेखांकित किया है, वैज्ञानिक संस्कृति ही किसी देश को विश्व स्तर पर अग्रणी (Global Leader) बना है। असंतुलन का खतरा यदि यह संतुलन बिगड़ जाए, तो परिणाम भयावह हो सकते हैं। बिना संस्कृति के विज्ञान 'शुष्क तकनीक' बनकर रह जाएगा जो रोबोट तो बना सकता है, पर इंसान नहीं। वहीं, बिना विज्ञान की संस्कृति 'कट्टरता' और 'पिछड़ेपन' का शिकार हो सकती है। आज की मुख्य चुनौती यह है कि हम कैसे अपनी जड़ों को सुरक्षित रखते हुए आधुनिकता के आकाश में उड़ें।
एक एकीकृत विजन आने वाले समय में हमें ऐसी 'वैज्ञानिक संस्कृति' की आवश्यकता है जो:
मानव-केंद्रित हो: जहाँ तकनीक का उद्देश्य केवल मुनाफा नहीं, बल्कि मानवीय कष्टों का निवारण हो। सतत हो जो प्रकृति को विरासत माने, संसाधन नही है।: जहाँ वैश्विक ज्ञान का प्रवाह हो, लेकिन स्थानीय पहचान सुरक्षित रहे है। विज्ञान और संस्कृति का संगम ही वह मार्ग है जिससे एक न्यायसंगत विश्व का निर्माण होगा। हमें ऐसी दुनिया चाहिए जहाँ प्रयोगशालाओं में भविष्य गढ़ा जाए और हमारे मूल्यों से उस भविष्य को सींचा जाए। जब तकनीकी आयाम और सांस्कृतिक मूल्य एक साथ चलेंगे, तभी विकास वास्तव में 'सार्थक' कहला सकते हैं।
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