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भद्रा, पूर्णिमा और चंद्रग्रहण के बीच इस बार कैसे मनाई जाएगी होली?

भद्रा, पूर्णिमा और चंद्रग्रहण के बीच इस बार कैसे मनाई जाएगी होली?

दिव्य रश्मि के उपसम्पादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से |

भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव नहीं होते हैं, वे समय, प्रकृति और आस्था के बीच एक गहन संवाद होते हैं। “होली” जिसे रंगोत्सव, फागोत्सव और वसंत का महापर्व कहा जाता है, हर वर्ष अपने साथ उल्लास, सामाजिक समरसता और धार्मिक परंपराओं का अनूठा संगम लेकर आती है। लेकिन कुछ वर्ष ऐसे भी होते हैं जब पंचांग की गणनाएँ, ग्रह-नक्षत्रों के संयोग और शास्त्रीय नियम इस पर्व को साधारण से कहीं अधिक जटिल बना देते हैं।


इस वर्ष होली ठीक ऐसे ही खगोलीय और धार्मिक संयोगों के बीच आई है, जब भद्रा काल, फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, और चंद्रग्रहण, तीनों एक-दूसरे से टकराते प्रतीत होते हैं। परिणामस्वरूप देशभर में, विशेषकर उज्जैन जैसे धार्मिक नगर में, यह प्रश्न प्रमुख हो गया है कि होलिका दहन कब हो और धुलंडी किस दिन मनाई जाए।


होलिका दहन की कथा प्रह्लाद और होलिका से जुड़ी है। यह कथा बताती है कि ईश्वर में अटूट विश्वास रखने वाला बालक प्रह्लाद अग्नि में भी सुरक्षित रहा, जबकि अहंकार और अधर्म की प्रतीक होलिका भस्म हो गई। इसीलिए होलिका दहन को बुराई के दहन और सद्गुणों की विजय के रूप में देखा जाता है।


धुलंडी के दिन रंगों के माध्यम से भेदभाव मिटता है। जाति, वर्ग, धर्म और आयु की सीमाएँ टूट जाती हैं। यही कारण है कि होली को सामाजिक समरसता का पर्व कहा गया है।


इस वर्ष होली से जुड़े तीन प्रमुख कारक हैं। पहला फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, दूसरा भद्रा काल और तीसरा चंद्रग्रहण। इन तीनों के कारण होलिका दहन और धुलंडी की तिथि को लेकर असमंजस उत्पन्न हुआ है।


ज्योतिषाचार्य के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा 2 मार्च को शाम 5 बजकर 55 में आरंभ होगी। पूर्णिमा का मघा नक्षत्र में होना इसे धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है। शास्त्रों के अनुसार, पूर्णिमा तिथि में ही होलिका दहन करना श्रेष्ठ माना गया है।


भद्रा काल को ज्योतिष में अशुभ समय माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस अवधि में मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। भद्रा मुख काल अत्यंत अशुभ होता है, इसमें होलिका दहन निषिद्ध है। भद्रा पूंछ काल कुछ शास्त्रों में सीमित कार्यों की अनुमति होती है। इसी भेद के कारण इस वर्ष निर्णय लेना कठिन हो गया है।


ज्योतिर्विद के अनुसार, 2 मार्च रात 8 बजकर 54 से भद्रा प्रारंभ होगी और 3 मार्च सुबह 5 बजे तक भद्रा प्रभावी रहेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि 2 मार्च की शाम 6 बजकर 30 से 8 बजकर 54 के बीच भद्रा से पूर्व या पूंछ काल में होलिका दहन संभव है।


3 मार्च को चंद्रग्रहण है। ग्रहण का सूतक काल ग्रहण से 12 घंटे पूर्व लगता है। ऐसी स्थिति में सूतक के कारण सुबह से ही धार्मिक अनुशासन आवश्यक। ग्रहण मोक्ष शाम 6 बजकर 46 है और चंद्रोदय का समय शाम 6 बजकर 32 मिनट है। ग्रहण के बाद शुद्धिकरण कर ही किसी भी पूजा-पाठ की अनुमति होती है।


सूतक काल में मंदिरों के पट बंद रहते हैं। पूजा, जप, हवन वर्जित होता है। भोजन पकाना निषिद्ध रहता है। मानसिक और शारीरिक शुद्धता पर बल दिया जाता है। इसी कारण से 3 मार्च को होलिका दहन का विकल्प स्वतः समाप्त हो जाता है।


सभी शास्त्रीय गणनाओं और विद्वानों की राय के अनुसार, 2 मार्च को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद), शाम 6 बजकर 30 से 8 बजकर 54 बजे के बीच, भद्रा पूंछ में होलिका दहन को सर्वमान्य और शास्त्रसम्मत माना गया है।


3 मार्च को सुबह से चंद्रग्रहण का प्रभाव, ग्रहण मोक्ष के बाद शुद्धिकरण, प्रतिपदा तिथि शाम 6 बजकर 50 से प्रारंभ, इसलिए धुलंडी 3 मार्च को ही मनाई जाएगी।


उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में होली का उत्सव पूरे देश में विशिष्ट माना जाता है। 2 मार्च को संध्या आरती के बाद मंदिर परिसर में होलिका दहन। 3 मार्च को सुबह भस्म आरती में बाबा महाकाल को पहला गुलाल। इसके बाद पूरे नगर में रंगोत्सव का आरंभ। मंदिर के पुजारी के अनुसार, परंपरा का पालन करते हुए ग्रहण और भद्रा के नियमों का पूर्ण सम्मान किया जाएगा।


महाकाल की भस्म आरती विश्वप्रसिद्ध है। होली के अवसर पर भस्म के साथ गुलाल अर्पण, शिव को रंगों से श्रृंगारित करने की परंपरा और भक्तों के लिए यह क्षण अत्यंत भावनात्मक होता है।


इस वर्ष की होली यह सिखाता है कि आस्था और उत्सव में संतुलन आवश्यक है, शास्त्र केवल निषेध नहीं, मार्गदर्शन भी करता है। प्रकृति और ब्रह्मांडीय घटनाओं का सम्मान भारतीय संस्कृति की विशेषता है


पंचांगों में स्थानीय भिन्नताएँ, नक्षत्र और तिथि की सूक्ष्म गणना, परंपराओं का क्षेत्रीय स्वरूप के कारण हर वर्ष अलग-अलग मत सामने आते हैं। ज्योतिषाचार्य केवल तिथि नहीं बताते हैं, बल्कि शास्त्रों का व्यावहारिक अनुप्रयोग करते हैं। समाज को अनावश्यक भय से मुक्त करते हैं। परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु बनते हैं।


आज के डिजिटल युग में भी लोग पंचांग देखते हैं। मुहूर्त का पालन करते हैं। ग्रहण और सूतक को गंभीरता से लेते हैं। यह दर्शाता है कि भारतीय परंपराएँ आज भी जीवंत हैं।


इस वर्ष की होली संयम और समझ के साथ उत्सव मनाने का संदेश देती है। 2 मार्च को होलिका दहन और 3 मार्च को धुलंडी और रंगोत्सव मनाया जाएगा। भद्रा, पूर्णिमा और चंद्रग्रहण, तीनों के बीच संतुलन बनाकर मनाई जाने वाली यह होली न केवल धार्मिक दृष्टि से शुद्ध होगी, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी समृद्ध होगी। -------------
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