भारतीय संविधान की विषय वस्तु
डॉ राकेश कुमार आर्य
भारत का संविधान भारत को एक संघ के रूप में देखता है। इसको लेकर कई विद्वानों ने भारतीय संविधान की आलोचना भी की है। आलोचना का आधार यह है कि भारत किन्हीं विभिन्न राज्यों की लिखित सहमति के आधार पर बना हुआ देश नहीं है, यह एक सनातन राष्ट्र है। जिसे संघीय देश नहीं कहा जा सकता। जब संसार में कोई भी देश नहीं था, तब संसार को एक ईकाई के रूप में भारत ही शासित अनुशासित करता था। इसी की बनाई हुई विधि सर्वत्र अपनाई जाती थी। यह और भी अधिक प्रसन्नता का विषय है कि यह विधि किसी और की बनाई हुई विधि नहीं थी बल्कि महर्षि मनु की मनुस्मृति के रूप में ही जानी जाती थी। इस प्रकार जब संसार में कोई भी देश नहीं था तब ब्रह्मावर्त , आर्यावर्त और भारतवर्ष के नाम से ही सारे संसार को जाना जाता था। ऐसी परिस्थितियों में यह कभी संभव नहीं हो सकता था कि विभिन्न देश अपनी राष्ट्रीयताओं को भारत के साथ सम्मिलित करने संबंधी कोई सहमति पत्र प्रदान करते और भारत को एक राष्ट्र के रूप में खड़ा करने में अपना सहयोग प्रदान करते। स्वाधीनता प्राप्ति तक जितना भारत था- वह सृष्टि के प्रारंभ से ही अपनी पारस्परिक स्वाभाविक सहमति के आधार पर चला आ रहा भारत था। जिसे भारत का प्रत्येक सनातनी अपना राष्ट्र मानकर सम्मान देता था। उसके प्रति अपनी निष्ठा और श्रद्धा व्यक्त करता था। उसे भारत को संघ के रूप में जानने की तत्कालीन परिस्थितियों में कोई आवश्यकता नहीं थी हमारा मानना है कि स्वाभाविक रूप से एक साथ मिलकर चले आ रहे इस सनातन राष्ट्र के नाम के साथ '' संघ " शब्द जोड़ना इसकी सनातन संस्कृति का अपमान करना है। ' भारत संघ ' जैसे शब्द पर तो संविधान सभा के समक्ष चर्चा तक भी नहीं होनी चाहिए थी।
मानवता का मार्गदर्शक भारतवर्ष
भारत को ' मानवता का पालना ' कहा जाता है। इसका अभिप्राय है कि मानवता भारत से ही विकसित हुई है। संसार को मानवता का पाठ पढ़ाने वाला विश्व गुरु भारत ही रहा है। संपूर्ण मानवता का मार्गदर्शक और पथप्रशस्त करने वाला भारत ही रहा है। भारत के विशाल वैश्विक साम्राज्य को तोड़-तोड़कर विभिन्न देशों का निर्माण हुआ है। जिन लोगों ने भारत के विशाल वैश्विक साम्राज्य को तोड़ने का महापाप किया, उन्हीं को विश्व इतिहास के महानायक के रूप में प्रस्तुत की किया गया है। जितने जितने बड़े लुटेरे हमलावर भारत में आए , वे सब भारत की एकता और अखंडता के शत्रु थे। जिनका महिमामंडन करना भारत के गौरवपूर्ण इतिहास को भुलाना माना जाता है। उसी भारत को आज संघीय राज्य कहना भारत के अत्यंत दीर्घकालिक इतिहास के साथ अन्याय करना होगा। वर्तमान भारत के छोटे से खंड को भी भारत संघ कहकर भारत के उन चक्रवर्ती सम्राटों की दीर्घकालिक परंपरा का उपहास किया गया है, जिन्होंने विश्व साम्राज्य स्थापित कर भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को विश्व के कोने-कोने में पहुंचाने का राष्ट्रवंद्य कार्य किया था।
इतिहास के गौरवपूर्ण पक्ष को भुलाया गया
यह कार्य महर्षि मनु और मांधाता से प्रारंभ होकर युधिष्ठिर और उसके पश्चात के मौर्यवंश , गुप्तवंश के साम्राज्य से निकलते हुए कश्मीर के करकोटा साम्राज्य के बाद गुर्जर प्रतिहार वंश तक चला आता है। इन सभी सम्राटों का सारा पुरुषार्थ अपने भारत के खोए हुए सम्मान को प्राप्त करने के लिए किया गया था। हमारी संविधान सभा को इन सारे महान पुरुषार्थी सम्राटों को उचित सम्मान देते हुए संविधान के प्रारंभ में ही स्पष्ट करना चाहिए था कि हम अपने इतिहास के गौरवपूर्ण पृष्ठों का स्मरण करते हुए और अपने महान सम्राटों को नमन करते हुए संकल्प लेते हैं कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने का तो प्रयास करेंगे ही, इसे बढ़ाने का भी प्रयास करेंगे। ऐसा ना लिखकर संविधान सभा ने उन राष्ट्र विरोधी शक्तियों के सामने झुकने का संकेत दिया जो भारत के गौरवपूर्ण इतिहास को विस्मृति करने के लिए काम कर रही थीं।
इस संबंध में डॉ भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था " परिसंघ का आधारभूत सिद्धांत यह है कि संविधान द्वारा विधाई और कार्यपालिका शक्तियों को केंद्र और राज्य के बीच विभाजित किया जाता है। केंद्र द्वारा बनाई गई विधि से नहीं बल्कि स्वयं संविधान द्वारा।.... परिसंघ का मुख्य लक्षण विधाई और कार्यपालिका शक्तियों का संविधान द्वारा केंद्र और इकाइयों में विभाजन है । यह सिद्धांत हमारे संविधान में समाविष्ट है। इसके बारे में शंका करने का कोई स्थान नहीं है।"
भारतीय संविधान की विशेषता
हम चाहेंगे कि जिस प्रकार हमने मनु के द्वारा लिखित मनुस्मृति के व्यापक विषयों को सांकेतिक रूप में पूर्व में उल्लिखित किया है उसी प्रकार भारतीय संविधान के भीतर समाविष्ट विषयों को भी स्पष्ट करने के लिए उन बिंदुओं को देख लिया जाए जिन पर हमारा संविधान विचार करता है या किसी धारा विशेष में उनका उल्लेख करता है।
भारतीय संविधान की विशेषता बताते समय हमें पढ़ाया जाता है कि यह संविधान विश्व का सबसे विस्तृत संविधान है, जो कि लोगों को एकल नागरिकता प्रदान करता है। यह भी बताया जाता है कि संशोधनों के माध्यम से इस संविधान को लचीला बनाए रखने में सहायता मिलती है। यह एक परिसंघ संविधान की श्रेणी में आता है। परिसंघ संविधान के माध्यम से लोगों को तीन स्तर की सरकार प्रदान की गई है। उनके मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है। राज्य के नीति निदेशक तत्वों को इस संविधान में स्थान दिया गया है। न्यायिक पुनर्विलोकन का भी अवसर प्रदान किया गया है। देश में स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है।
नौवीं अनुसूची के द्वारा संरक्षण का भी विधान किया गया है। देश में संसदीय प्रणाली का शासन प्रणाली स्थापित कर गणराज्य की कल्पना की गई है। अल्पसंख्यकों के लिए रक्षोपाय करने पर भी गंभीरता पूर्वक ध्यान दिया गया है। सार्वजनिक मताधिकार सुनिश्चित किया गया है। ऐसी व्यवस्था भी की गई है कि किन परिस्थितियों में देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है ? अर्थात देश की एकता और अखंडता के लिए यदि कोई खतरा उत्पन्न हो गया हो ( जैसे बाहरी आक्रमण या आंतरिक विद्रोह की स्थिति का बनना तो नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है। ) इस संबंध में हमें ध्यान देना चाहिए कि महर्षि मनु जैसे महापुरुष भी इस बात को जानते समझते रहे हैं कि आपत्ति काल में कोई मर्यादा नहीं होती, परंतु इसके उपरांत भी युद्ध जैसी परिस्थितियों में इस बात का हरसंभव प्रयास किया जाता था कि नागरिकों के सामान्य जीवन पर कोई प्रभाव न पड़े और युद्ध केवल और केवल युद्ध क्षेत्र तक ही सीमित रहे। ऐसी व्यवस्था करना युद्ध की मर्यादाओं के अंतर्गत आता था। महाभारत में भी ऐसी व्यवस्था की गई थी।
(लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुविख्यात इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com