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मातृभाषा के बिना अधूरी है संस्कृति की पहचान: सत्येंद्र कुमार पाठक

मातृभाषा के बिना अधूरी है संस्कृति की पहचान: सत्येंद्र कुमार पाठक

जहानाबाद । "भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी भी समाज की आत्मा और उसकी संस्कृति का आईना होती है। जिस दिन हम अपनी मातृभाषा भूल जाएंगे, उस दिन हमारी पहचान भी मिट जाएगी।" ये विचार प्रख्यात साहित्यकार सत्येंद्र कुमार पाठक ने अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर आयोजित एक विशेष संगोष्ठी में व्यक्त किए। श्री पाठक ने इतिहास के झरोखे से युवाओं को रूबरू कराते हुए बताया कि इस दिवस की नींव 21 फरवरी 1952 को ढाका (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में पड़ी थी। अपनी मातृभाषा 'बांग्ला' के सम्मान के लिए छात्रों ने गोलियां खाईं और शहादत दी। उन्हीं के बलिदान को वैश्विक सम्मान देते हुए यूनेस्को ने 1999 में इस दिन को मान्यता दी। उन्होंने विशेष जोर देते हुए कहा कि वर्ष 2025 इस ऐतिहासिक दिवस की 'सिल्वर जुबली' (25वीं वर्षगांठ) है, जो हमें अपनी भाषाई जड़ों की ओर लौटने का संदेश देती है।विलुप्ति के कगार पर हजारों भाषाएं यूनेस्को की रिपोर्ट का हवाला देते हुए साहित्यकार ने चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि दुनिया की 8,324 भाषाओं में से लगभग 7,000 ही चलन में हैं और कई दम तोड़ रही हैं। बिहार की समृद्ध भाषाई विरासत की चर्चा करते हुए उन्होंने मगही, भोजपुरी, मैथिली, अंगिका और बज्जिका को बचाने की अपील की। उन्होंने कहा, "बहुभाषी शिक्षा और मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षण ही वह संजीवनी है, जो हमारी लोक परंपराओं को जीवित रख सकती है ।कार्यक्रम के अंत में उन्होंने जिले के युवाओं से अपील की कि वे अपनी मातृभाषा बोलने में लज्जा नहीं, बल्कि गर्व महसूस करें। उन्होंने कहा कि स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण से ही हम अपने अधिकारों और सांस्कृतिक गौरव की रक्षा कर सकते हैं। इस अवसर पर कई प्रबुद्धजनों ने अपनी-अपनी मातृभाषा में काव्य पाठ कर भाषाई विविधता का जश्न मनाए।
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