"आत्मसम्मान की शांत साधना"
पंकज शर्मा
मनुष्य का हृदय जिन संबंधों में अपनी समूची संवेदना उड़ेल देता है, वही संबंध कभी-कभी उसकी आत्मा की सबसे कठिन परीक्षा बन जाते हैं। जब स्नेह, अपनत्व और समर्पण का उत्तर उपेक्षा में मिले, तब उदासीनता पलायन नहीं, बल्कि आत्म-रक्षा की साधना बन जाती है। यह वैराग्य किसी कठोरता से नहीं, बल्कि उस मौन बोध से उपजता है जहाँ व्यक्ति समझ लेता है कि आत्मा की गरिमा किसी भी संबंध से ऊपर है। वहाँ त्याग दुःख नहीं देता, बल्कि अंतःकरण को हल्का कर देता है।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो यह उदासीनता अहं का विस्तार नहीं, आत्मसम्मान का विस्तार है। जैसे दीपक स्वयं को जलाकर प्रकाश देता है, पर हवा के थपेड़ों से स्वयं को बचाना भी जानता है। आत्मा भी वहीं तक झुकती है, जहाँ तक उसका मौन अपमान न बने। जो संबंध व्यक्ति को भीतर से रिक्त कर दें, उनसे दूरी बना लेना ही आत्म-कल्याण का मार्ग होता है। इसी भाव को एक मुक्तक यूँ कहता है—
जो मूल्य न जाने भावनाओं के, उनसे दूरी ही धर्म हुई।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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