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सुबह हुई, शाम हुई, ज़िंदगी तमाम हुई…

सुबह हुई, शाम हुई, ज़िंदगी तमाम हुई…

डॉ. राकेश दत्त मिश्र
सुबह हुई, उम्मीदें जागीं,
ओस की बूंदों में सपनों की रागिनी।
चल पड़े हम भीड़ के संग,
सोचा—आज कुछ अलग होगा ज़िंदगी में कहीं।

दोपहर आई, पसीने में भीगी,
संघर्षों की धूप तीखी लगी।
कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ,
फिर भी मुस्कान होंठों से न हटी।

शाम हुई, साए लंबे हुए,
थके कदम घर की राह चले।
चाय की भाप में यादें घुलीं,
कई अपने, कई ख़्वाब पीछे छूट चले।

रात आई, ख़ामोशी छा गई,
सितारों ने किस्से सुनाए।
जो पाया, जो खो दिया हमने,
सब नींद की चादर में सिमट जाए।

सुबह हुई, शाम हुई, ज़िंदगी तमाम हुई
पर एहसास ये रह गया मन में कहीं,
ज़िंदगी लम्हों का नाम है बस,
जो जिया… वही असल में काम हुआ।
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