अन्न का वितरण खेत से थाली तक -पारंपरिक रूप ।
जय प्रकाश कुवंर
गृहस्थ किसान जो अन्न अपने खेतों में चिरकाल से उपजाता चला आ रहा है उसे वह अकेला नहीं खाता था। उसका उपजाया हुआ अन्न किसी न किसी रूप से समाज के सभी वर्गों तक पहुँचता रहा है। यहाँ तक की उसके उपज को ग्रहण करने में मनुष्य का सहभागी मनुष्य के अलावा देवता और पशु पक्षी भी होते रहे हैं।
देश के हर क्षेत्र में आधुनिक मशीनीकरण की बात छोड़ दिया जाए तो पहले खेती का काम मानव और पशुओं ( हल बैल ) से ही होता था। किसान गृहस्थ के खेतों में फसल पक कर तैयार हो जाने के बाद उसकी कटाई मजदूर बनिहारों द्वारा होती थी।बनिहारी के रूप में उन्हें पैसा नहीं दिया जाता था बल्कि फसल का पांच से दश प्रतिशत उन्हें दिया जाता था। खेतों में कटाई के वक्त पान वाले, फूल वाले आदि पान फूल लेकर आते थे और गृहस्थ को पान फूल देकर फसल का कुछ हिस्सा ले जाते थे। इस तरह गृहस्थ किसान के उपज का कुछ हिस्सा उनके घर पहुँच जाता था।
फिर फसल की दंवाई मड़ाई खलिहान में मजदूर बनिहारों द्वारा ही की जाती थी। तैयार अन्न का राशि या ढेर लगता था। उसका वजन किया जाता था। वजन करने के पहले उस अन्न के राशि या ढेर को गृहस्थ प्रणाम करके उसमें से अगऊं निकाल देता था, जो ब्राह्मण एवं देवता को प्रदान किया जाता था। वजन करने के बाद वजन के हिसाब से उसमें से पांच से दश प्रतिशत मजदूर बनिहारों की बनिहारी निकाल दिया जाता था, जो सभी मजदूर आपस में बांट लेते थे। यहाँ भी बनिहारी के रूप में उन्हें पैसा नहीं बल्कि उपजे हुए अन्न का कुछ हिस्सा ही दिया जाता था। इस प्रकार गृहस्थ किसान के उपज का कुछ हिस्सा फिर उन मजदूर बनिहारों के घर पहुँच जाता था।
खलिहान से अन्न किसान गृहस्थ के घर पहुँचने पर उसमें से कुछ हिस्सा गृहस्थ किसान से जुड़े लोहार, धोबी, नाई आदि को साली ( साल में नई फसल के समय) के रूप में उन्हें दिया जाता था। इसके अलावा फसल घर में आने के समय गाँव देहात में भिक्षा मांगने वालों की तायदाद काफी बढ़ जाती थी, जो गाँव में घर घर घूम कर भिक्षा मांगते थे। उन्हें भी उपज के अन्न का कुछ हिस्सा दिया जाता था। उस समय किसी भी भिखारी को अन्न छोड़ पैसा नहीं दिया जाता था। इस तरह वह अन्न अनेकों परिवारों में पहुंचता था।
फिर नयी फसल किसान गृहस्थ के घर में आने के बाद परिवार में भोजन के लिए उसकी कुटाई पिसाई शुरू हो जाती थी। जिस घर में अपने हाथों कुटाई पिसाई नहीं होता था, वहाँ मजदूर या मजदूरनियों से कुटाई पिसाई कराने पर उन्हें पुनः मजदूरी कुटा पिसा अन्न ही दिया जाता था। इस प्रकार उपज का कुछ हिस्सा पुनः उन बनिहारों के घर पहुँच जाता था।
अब जब गृहस्थ किसान के घर में कुट पिस कर तैयार नये फसल के अन्न को खाने के लिए पकाया जाता रहा है ,तब पके हुए अन्न का कुछ हिस्सा सबसे पहले गाय एवं घर के अन्य मवेशियों के लिए निकाल दिया जाता रहा है और उन्हें खिला दिया जाता रहा है।इसे गौ ग्रास कहा जाता रहा है। फिर पके हुए अन्न को थाली में परोसा जाता है और उस समय भी भोजन करने से पहले उस अन्न ( भात रोटी ) का कुछ हिस्सा अग्राशन के रूप में भोजनकर्ता द्वारा निकाल कर उसे देवताओं, अग्नि तथा पूर्वजों को समर्पित किया जाता रहा है। इसे हिन्दू परंपरा में कृतज्ञता, भक्ति और भोजन को शुद्ध एवं सात्विक बनाने की प्रक्रिया माना जाता है। फिर उस सात्विक भोजन को गृहस्थ ग्रहण करते थे।
इस तरह हिन्दू संस्कारों के अनुसार पूर्व काल में परंपरागत रूप से गृहस्थ किसान के घर में खेतों में अन्न उपजाने से लेकर उसके थाली में आने और ग्रास बनने तक वह अन्न समाज के अनेकों लोगों के घर तक पहुँच जाता रहा है और उन्हें संतुष्टि देता रहा है। इस तरह का अन्न जिसे अनेकों को खिलाकर स्वयं खाने पर मनुष्य के जीवन में संतोष तथा सुख शांति बरकरार रहती थी और समाज में सामंजस्य रहता था। आज उन परंपरागत रास्ते से हटकर मानव ने अपना सुख चैन सब कुछ खो दिया है।
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