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वक्त को समझे

वक्त को समझे

संजय जैन
वक्त की रफ्तार कितनी
तेजी से दौड़ रही है।
जिसके साथ हम और आप
दौड़ नही पा रहे है।
न ही हम और आप उसे
पकड़ पा रहे है।
बस दूर से उसकी रफ्तार
हम देखे जा रहे है।।


कल को आज की नजर से
देखे जा रहे है।
वक्त को भी समझने की
कोशिस कर रहे है।
पर वक्त को हम पकड़
नही पा रहे है।
इसलिए खुदको असहाय
मेहसूस कर रहे है।।


जो भी वक्त की रफ्तार को
पकड़ कर दौड़ रहा है।
खुदको आधुनिक भी
मान जो रहा है।
इसलिए सफलता के झंडे
गाड़े जा रहा है।
और खुदको आधुनिक और
वक्त का हमसफर बता रहा है।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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