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संस्कारों की अनमोल धरोहर: स्नेह कुंज की गौरव

संस्कारों की अनमोल धरोहर: स्नेह कुंज की गौरव

सत्येन्द्र कुमार पाठक
शहर की कोलाहल से दूर एक शांत बस्ती में 'स्नेह कुंज' नाम का घर अपनी मर्यादा और शालीनता के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ तीन पीढ़ियाँ एक साथ रहती थीं। इस घर के मुखिया दादा जी थे, जिनके अनुशासन और प्रेम ने पूरे परिवार को एक सूत्र में पिरो रखा था। माता-पिता अपने बच्चों के लिए जीवंत उदाहरण थे। घर के दो सबसे छोटे और प्यारे सदस्य थे—दिव्यांशु (8 वर्ष) और प्रियांशु (3 वर्ष)।
सुबह के छह बजे थे। वातावरण में अगरबत्ती की हल्की सुगंध और पक्षियों का कलरव गूंज रहा था। घर के आंगन में तुलसी के पौधे के पास सूरज की सुनहरी किरणें खेल रही थीं। माता-पिता बैठक में शांत मुद्रा में बैठे थे, और दादा जी अपने लकड़ी के नक्काशीदार आसन पर विराजमान होकर गीता का पाठ कर रहे थे।
तभी नन्हा प्रियांशु, अपनी नींद भरी आँखों को मलता हुआ कमरे में आया। उसकी चाल में एक मासूमियत थी। जैसे ही उसने माता-पिता को देखा, वह अपनी सुस्ती भूल गया। उसने झुककर अपने छोटे-छोटे हाथ माता-पिता के चरणों में रखे और अपना माथा जमीन पर टिका दिया। पिता ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया और माता ने उसके माथे को चूमकर कहा, "मेरा प्यारा बच्चा, हमेशा सुखी रहो!"
इसके बाद प्रियांशु डगमगाते कदमों से दादा जी की ओर बढ़ा। दादा जी ने अपनी पुस्तक नीचे रखी और बड़े प्यार से देखा। प्रियांशु ने दादा जी के पैरों पर सिर झुकाया। दादा जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "बेटा, जो बच्चा सूर्योदय के समय अपने बड़ों का आशीर्वाद लेता है, उसकी बुद्धि और शक्ति सूर्य के समान तेजस्वी हो जाती है।"
उधर, आठ वर्षीय दिव्यांशु अपने स्कूल की तैयारी कर चुका था। उसकी वर्दी साफ-सुथरी थी, जूते चमक रहे थे और बस्ता सलीके से सजा हुआ था। दिव्यांशु के लिए चरण स्पर्श करना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उसकी शक्ति का स्रोत था।
जाने से पहले वह सबसे पहले माता-पिता के पास गया। उसने अत्यंत शालीनता से झुककर उनके पैर छुए। माता-पिता ने उसे आशीर्वाद दिया, "आज तुम्हारी परीक्षा है, ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान करें।" अंत में वह दादा जी के पास गया। दादा जी ने उसे पास बैठाया और कहा, "दिव्यांशु, याद रखना—विद्या केवल किताबों में नहीं होती, वह हमारे आचरण में होती है। जो विनम्र है, वही सच्चा ज्ञानी है।"
दिव्यांशु ने दादा जी के पैर छुए, उनका आशीर्वाद अपनी स्मृतियों में संजोया और आत्मविश्वास के साथ स्कूल के लिए निकल पड़ा।
दिव्यांशु का स्कूल शहर का नामी विद्यालय था। वहाँ हर साल 'आदर्श छात्र' का चयन होता था। इस वर्ष चयन की प्रक्रिया कुछ अलग थी। प्रधानाचार्य जी ने गुप्त रूप से कुछ शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार पर नजर रखने के लिए कहा था।
लंच ब्रेक के समय, स्कूल के बगीचे में एक बुजुर्ग माली काका एक भारी गमला उठाने की कोशिश कर रहे थे। गर्मी के कारण उनका बुरा हाल था। कई बड़े बच्चे पास से गुजरे, कुछ ने मजाक उड़ाया और कुछ अनदेखा कर निकल गए। लेकिन दिव्यांशु से रहा नहीं गया। वह दौड़कर गया और बोला, "काका, आप रुकिए, मैं दूसरी तरफ से पकड़ता हूँ।"
माली काका ने कहा, "बेटा, तुम्हारे कपड़े गंदे हो जाएंगे।" दिव्यांशु ने हंसते हुए जवाब दिया, "काका, कपड़े तो साबुन से धुल जाएंगे, लेकिन अगर आपको चोट लग गई तो मुझे बहुत दुख होगा। मेरे दादा जी कहते हैं कि बुजुर्गों की सेवा साक्षात् ईश्वर की सेवा है।"
दिव्यांशु ने अपनी पूरी ताकत लगाकर गमला सही जगह रखवाया। माली काका के चेहरे पर जो मुस्कान आई, वह दिव्यांशु के लिए किसी मेडल से बड़ी थी।
अगले दिन प्रार्थना सभा में प्रधानाचार्य जी ने माइक संभाला। उन्होंने कहा, "आज मैं एक ऐसे छात्र को सम्मानित करने जा रहा हूँ जिसने न केवल पढ़ाई में नाम कमाया है, बल्कि मानवीय मूल्यों की परीक्षा में भी प्रथम स्थान प्राप्त किया है।"
जब दिव्यांशु का नाम पुकारा गया, तो वह संकोच के साथ मंच पर गया। प्रधानाचार्य जी ने कल की घटना सबको सुनाई और कहा, "दिव्यांशु को यह संस्कार उसके घर से मिले हैं। जो बच्चा अपने घर में बड़ों के पैर छूता है, वह समाज में कभी किसी का निरादर नहीं कर सकता।"
दिव्यांशु को एक बड़ी ट्रॉफी और स्वर्ण पदक दिया गया। पूरी सभा तालियों की गूँज से भर गई। शाम को जब दिव्यांशु घर लौटा, तो उसके हाथ में चमकती ट्रॉफी थी। उसने घर में प्रवेश करते ही सबसे पहले वह ट्रॉफी दादा जी के चरणों में रख दी। उसने फिर से माता-पिता और दादा जी के पैर छुए और कहा, "यह जीत मेरी नहीं, आप सबके दिए हुए संस्कारों की है।"
नन्हा प्रियांशु, जो अभी ठीक से बोल भी नहीं पाता था, अपने बड़े भाई को देखकर उत्साहित हो गया। उसने अपनी एक छोटी सी बॉल दादा जी के पास रख दी और झुककर वैसे ही प्रणाम किया जैसे दिव्यांशु ने किया था। यह देखकर पूरा परिवार खिलखिलाकर हँस पड़ा।
दादा जी की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने दोनों पोतों को गोद में बिठाया और ज्ञान की एक गहरी बात कही।
दादा जी ने कहा, "बच्चों, आज समाज में लोग डिग्रियां तो बहुत हासिल कर लेते हैं, लेकिन 'संस्कार' पीछे छूट जाते हैं। याद रखना, जीवन में तीन बातें हमेशा तुम्हें महान बनाएंगी:
अभिवादनशीलस्य: जो बड़ों का अभिवादन करते हैं, उनकी आयु, विद्या, यश और बल—ये चारों बढ़ते हैं।
विनम्रता: फलदार वृक्ष हमेशा झुके रहते हैं, वैसे ही गुणी व्यक्ति हमेशा विनम्र रहता है।
कृतज्ञता: कभी मत भूलो कि तुम्हें यहाँ तक पहुँचाने में तुम्हारे माता-पिता और गुरुओं का कितना बड़ा त्याग है।"
दिव्यांशु और प्रियांशु ने ध्यान से दादा जी की बात सुनी। उस दिन 'स्नेह कुंज' का वातावरण और भी पवित्र हो गया।


कहानी की शिक्षा
यह कहानी हमें सिखाती है कि संस्कार ही मनुष्य की असली पूँजी हैं। जिस घर में बड़ों का सम्मान और छोटों को प्यार मिलता है, वह घर स्वर्ग के समान होता है। शिक्षा का असली उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि एक अच्छा और संवेदनशील इंसान बनना है।



कविता: संस्कारों की महक
किरण सवेरे की जब आए, खुशियों का पैगाम वो लाए।
'स्नेह कुंज' का आंगन महके, पंछी मीठी बोली चहके।
माता-पिता और दादा जी, बैठे हैं मुस्काते जी,
सच्ची दौलत घर की देखो, बच्चे भाग्य जगाते जी।
नन्हा-मुन्ना है प्रियांशु, चंचल प्यारा है प्रियांशु।
माता-पिता के चरण छुए, और दादा के पैर पड़े।
सीखा उसने प्रेम भाव, और आदर के सच्चे रंग,
छोटा है पर संस्कार उसके, रहते हैं सबके ही संग।
बस्ता लेकर चला दिव्यांशु, पढ़ने को तैयार हुआ,
बड़ों के पावन चरणों में, उसका शीश निहाल हुआ।
दादा जी का हाथ सिर पर, माता-पिता की है दुआ,
जो झुकता है बड़ों के आगे, जग में उसका नाम हुआ।
विद्या केवल पुस्तक में नहीं, आचरण में बसती है,
विनम्रता जिस मन में हो, वहीं सफलता हँसती है।
सेवा, आदर और समर्पण, जीवन के अनमोल रतन,
इनसे ही महकेगा भारत, इनसे महकेगा चमन।


मुख्य शिक्षाएँ:
अभिवादन: बड़ों को प्रणाम करने से आयु, विद्या, यश और बल बढ़ता है।
अनुकरण: छोटे बच्चे वही करते हैं जो वे बड़ों को करते देखते हैं।
सफलता: अच्छे संस्कार ही जीवन की सबसे बड़ी ट्रॉफी हैं।




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