लोकतंत्र का 'मॉर्डन सर्कस
सत्येन्द्र कुमार पाठक
आज का भारतीय लोकतंत्र एक ऐसे 'मॉर्डन सर्कस' में तब्दील हो चुका है, जहाँ प्रकृति के शाश्वत नियम उलट दिए गए हैं। पुराने ज़माने में शेर जंगल का राजा होता था, जो अपनी शक्ति और गरिमा के लिए जाना जाता था। लेकिन आज की 'सोशल इंजीनियरिंग' वाली राजनीति में प्रतिभा के उस शेर को 'आरक्षण' और 'वोट बैंक' के पिंजरे में कैद कर दिया गया है, जबकि गीदड़ों की फौज को शाही परेड का नेतृत्व सौंपा गया है। कुत्ता अपनी वफादारी भूलकर अब केवल सत्ता की कुर्सी के लिए भौंक रहा है, और गदहे इस बात पर गर्व कर रहे हैं कि उनकी 'भीड़' ही लोकतंत्र की असली ताकत है।
इस सर्कस के पीछे जो सबसे घिनौना खेल चल रहा है, वह है भारत की उच्च शिक्षा और सामाजिक समरसता की बलि चढ़ाना। विकास की बातें अब चुनावी रैलियों में बोरियत पैदा करती हैं, इसलिए राजनीति के 'स्पेशल शेफ' अब जातिवाद और संप्रदायवाद के तीखे मसालों का 'तड़का' लगाकर नफरत की हांडी चढ़ा रहे है । यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC), जिसे कभी भारतीय शिक्षा का संरक्षक माना जाता था, आज राजनीति की 'नई रखैल' बनती जा रही है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में सत्ता ने हमेशा शिक्षा को अपनी विचारधारा की गुलाम बनाने की कोशिश की, लेकिन वर्तमान दौर का यह संबंध 'टॉक्सिक' (विषाक्त) हो गया है। हालिया वर्षों में यूजीसी के नियमों, फंडिंग और स्वायत्तता को लेकर जो घमासान मचा है, वह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं है। इसके पीछे वही पुरानी जातिवादी खुजली है, जो कभी सड़कों पर नारों के रूप में शुरू हुई थी और आज अकादमिक गलियारों तक पहुँच गई है। जब प्रोफेसरों की भर्ती के लिए 'रोस्टर' बदला जाता है या 'प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस' जैसे जुमले लाए जाते हैं, तो मंशा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की कम, और अपने 'चाटुकार गदहों' को विश्वविद्यालयों के शीर्ष पर बैठाने की ज्यादा होती है। योग्यता का शेर आज भी बाहर खड़ा होकर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा है, जबकि च्यवनप्राश खाए हुए 'आधुनिक असुर' कुलपति की कुर्सियों पर बैठकर भविष्य की नीतियां तय कर रहे हैं।
नारों का ज़हर: 'भुराबाल' से 'तिलक-तराजू' तक का सफर - 90 के दशक की मंडल राजनीति ने भारतीय शब्दकोश को कुछ ऐसे गंदे और हिंसक शब्द दिए, जिन्होंने समाज के ताने-बाने को तार-तार कर दिया। "भुराबाल साफ करो और परवल चबाओ" जैसे नारे दरअसल राजनीतिक रसोइयों की वह 'स्पेशल रेसिपी' थे, जिनका मकसद जनता का पेट भरना नहीं, बल्कि समाज में नफरत की ऐसी भूख जगाना था जो पीढ़ियों तक शांत न हो। 'भुराबाल' (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) को साफ करने की बात करना केवल एक वर्ग के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह उस बौद्धिक परंपरा पर हमला था जिसे 'उच्च वर्ग' का एकाधिकार मान लिया गया।
इसके जवाब में जब "तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार" जैसे नारे आए, तो राजनीति ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसे 'बौद्धिक भारत' नहीं, बल्कि 'जातिगत कबीला' चाहिए। जूते अब सिर्फ पैरों में पहनने के लिए नहीं रहे, बल्कि वे दूसरों की गरिमा को कुचलने और 'जुमलों' की तरह उछालने के लिए इस्तेमाल होने लगे। इन नारों ने विश्वविद्यालयों के परिसरों को युद्ध का मैदान बना दिया। आज का छात्र किसी शोध पत्र (Research Paper) को उसकी गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि इस आधार पर पढ़ता है कि वह 'मनुवादी' है या 'दलित समर्थक'।
आज की राजनीति में 'मनुवाद' एक ऐसा शब्द है जिसे किसी भी विरोधी को चुप कराने के लिए 'ब्रह्मास्त्र' की तरह इस्तेमाल किया जाता है। सनातन धर्म के ग्रंथों को जलाना अब 'प्रगतिशीलता' का नया सर्टिफिकेट बन गया है। बिना मनुस्मृति को पढ़े, उसे गालियों का पर्याय बना देना एक विशिष्ट राजनीतिक युग की पहचान है। लेकिन यहाँ एक अजीब विडंबना है—एक तरफ ग्रंथों को जलाया जाता है, तो दूसरी तरफ चुनावी रैलियों में वही नेता जनेऊ और टीका दिखाकर अपनी 'भक्ति' सिद्ध करने की होड़ में लग जाते हैं। 'मनुवाद' को गाली देना फैशन है, लेकिन उसी 'जातिवाद' के नाम पर अपनी जाति के लोगों को डराकर वोट बटोरना 'मास्टरस्ट्रोक' माना जाता है। नेताओं ने यह समझ लिया है कि यदि वे विकास की बात करेंगे, तो जनता स्वास्थ्य और रोजगार पर सवाल पूछेगी; लेकिन अगर वे 'मनुवाद बनाम असुरवाद' की लड़ाई छेड़ देंगे, तो जनता भावनाओं के सैलाब में बह जाएगी।
आज के दौर के नेताओं को वास्तव में असुरवाद, दैत्यवाद और राक्षसवाद का नया अनुयायी कहा जा सकता है। प्राचीन ग्रंथों में राक्षसों की परिभाषा क्या थी? दूसरों का हक छीनना, समाज में भय फैलाना, नियमों को अपनी शक्ति से कुचलना और यज्ञों (पवित्र कार्यों) में विघ्न डालना। आज के 'खद्दरधारी असुर' ठीक यही कर रहे हैं।
दानववाद की भूख: इसका अर्थ है जनता के गाढ़े पसीने की कमाई (टैक्स) का दानव की तरह भक्षण करना। चाहे शिक्षा का बजट हो या यूजीसी की ग्रांट, ये आधुनिक असुर सब कुछ हड़प लेना चाहते हैं। राक्षसवाद का प्रदर्शन: जिस तरह राक्षस संस्कृति और सद्भाव को कच्चा चबा जाते थे, आज के नेता हमारी साझी विरासत और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को अपने स्वार्थ के लिए निगल रहे हैं। असुरवाद की अफीम: मेधावी युवाओं को मुख्यधारा से काटकर, उन्हें 'असुरवाद' की अफीम चटाकर उग्रवाद और जातिगत नफरत की ओर धकेलना ही इन आधुनिक असुरों की सबसे बड़ी कामयाबी है। जब राजनीति 'भैंस' की तरह अड़ियल हो जाए और तर्क को अपने सींगों पर उठा ले, तो समझ लेना चाहिए कि देश की बौद्धिक संपदा खतरे में है।
संविधान समानता की बात करता है, लेकिन हमारे राजनेता इसे 'असमानता के प्रबंधन' की किताब मानते हैं। आरक्षण, जो एक अस्थायी सामाजिक मरहम होना चाहिए था, उसे अब 'राजनीतिक ऑक्सीजन' बना दिया गया है। सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में स्वर्णवर्ग बनाम पिछड़ा वर्ग की यह लड़ाई अब घरों और मोहल्लों तक पहुँच गई है।
संविधान एक ऐसी किताब बन गई है जिसे हर नेता अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ता है। जब भी यूजीसी में पारदर्शिता की बात आती है, तो उसे 'संविधान खतरे में है' का नारा देकर दबा दिया जाता है। सच तो यह है कि संविधान को सबसे बड़ा खतरा उन्हीं 'गीदड़ों' से है जो 'शेर' की खाल ओढ़कर संवैधानिक पदों पर बैठे हैं और अंदर ही अंदर व्यवस्था को दीमक की तरह कुतर रहे हैं। आरक्षण अब उत्थान का साधन कम और चुनावी 'फिक्स्ड डिपॉजिट' ज्यादा बन गया है।
विश्वविद्यालय अब ज्ञान के प्रसार केंद्र नहीं, बल्कि राजनीति के 'प्रशिक्षण केंद्र' बन गए हैं। यूजीसी के फंड की पाइपलाइन अब सीधे सत्ता की चाबी से खुलती है। शोध (Research) की स्थिति यह है कि अब वैज्ञानिक अविष्कारों के बजाय इस पर पीएचडी हो रही है कि "जातिगत नारों का चुनावी प्रभाव क्या है"। शिक्षा संस्थानों में अब शोध इस बात पर कम होता है कि देश को नई तकनीक कैसे मिले, बल्कि इस पर ज्यादा होता है कि किस ग्रंथ में असुरों को महान और देवताओं को खलनायक दिखाया गया है। प्रतिभा का पलायन (Brain Drain) इसी का परिणाम है। जब मेधावी छात्र देखता है कि उसकी डिग्री से ज्यादा उसकी 'जाति' और 'राजनैतिक रसूख' भारी है, तो वह देश छोड़ने पर मजबूर हो जाता है। पीछे बच जाते हैं वे 'गदहे' जो भारी बोझ ढोने को तैयार हैं और वे 'कुत्ते' जो मालिक के एक इशारे पर भौंकने के लिए प्रशिक्षित है । अंततः, वर्तमान राजनीति एक ऐसी 'भैंस' बन गई है जिसकी पीठ पर सवार होकर हर नेता चुनावी वैतरणी पार करना चाहता है। इस राजनीति में बुद्धिजीवी (शेर) को चुप करा दिया गया है क्योंकि वह 'वोट' नहीं देता। कुत्ता (चाटुकार मीडिया और कार्यकर्ता) केवल अपने मालिक के पक्ष में भौंकता है। गदहा (अंधभक्त जनता) भारी बोझ ढो रहा है और खुश है कि उसे 'मुफ्त की रेवड़ी' मिल रही है। उच्च शिक्षा और यूजीसी का भविष्य तब तक अधर में रहेगा जब तक 'जातिवादी नारे' और 'असुरवादी प्रवृत्तियां' राजनीति का केंद्र रहेंगी। हमें ऐसे नेताओं की नहीं, बल्कि ऐसे मार्गदर्शकों की जरूरत है जो 'तिलक' और 'तलवार' को गाली देने के बजाय 'कलम' और 'किताब' को सम्मान दिला सकें। हमें समाज को यह समझाना होगा कि परवल चबाने या जनेऊ तोड़ने से पेट नहीं भरता, बल्कि शिक्षा और रोजगार से जीवन सवरता है। यदि हमने समय रहते इस 'मॉर्डन सर्कस' को बंद नहीं किया, तो हमारा लोकतंत्र एक ऐसे विशाल 'राक्षस' का रूप ले लेगा जो अंततः अपने ही बच्चों का भविष्य खा जाएगा। अब समय नारों के पीछे भागने का नहीं, बल्कि उन हाथों को कलम थमाने का है जो भविष्य की इबारत लिख सकें। वरना, यह 'भुराबाल साफ करने' और 'मनुवाद' को कोसने का सिलसिला चलता रहेगा और हम केवल खंडहरों पर बैठकर अपनी महानता के झूठे गीत गाते रहेंगे। सर्कस के सुल्तान बदलते रहेंगे, लेकिन यदि खेल के नियम नहीं बदले, तो दर्शक (जनता) हमेशा की तरह खाली हाथ और भ्रमित ही रहेगी। अब समय आ गया है कि हम 'नारों' की जगह 'नीतियों' की मांग करें और 'जाति' की जगह 'योग्यता' को अपना आधार बनाएं।
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