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मकर संक्रांति: सौर संवत का उल्लास

मकर संक्रांति: सौर संवत का उल्लास

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारत एक ऐसा देश है जहाँ पर्व केवल छुट्टियाँ नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान, कृषि और अध्यात्म का जीवंत संगम हैं। इन्हीं पर्वों में 'मकर संक्रांति' का स्थान सर्वोपरि है। यह त्यौहार उस समय आता है जब प्रकृति अपना चोला बदलती है और सूर्य देव अपनी दिशा। आइए, इस महासंयोग के इतिहास, इसके वैज्ञानिक आधार और चारों युगों के दिलचस्प सफर को विस्तार से समझते हैं. खगोलीय और वैज्ञानिक आधार: बदलती है सूर्य की चाल? वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मकर संक्रांति एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 23.5 झुकी हुई है और सूर्य की परिक्रमा करती है। वर्ष के छह माह सूर्य दक्षिणी गोलार्ध की ओर झुका होता है (दक्षिणायन), जिससे उत्तरी गोलार्ध में ठंड अधिक होती है।लेकिन मकर संक्रांति वह क्षण है जब सूर्य धनु राशि को त्यागकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसे 'उत्तरायण' कहते हैं। खगोल शास्त्र के अनुसार, इस दिन से उत्तरी गोलार्ध में दिन लंबे और रातें छोटी होने लगती हैं। यद्यपि आधुनिक गणना के अनुसार यह घटना 21-22 दिसंबर को होती है, लेकिन भारतीय पंचांग की 'निरयण पद्धति' के अनुसार हम इसे 14 या 15 जनवरी को मनाते हैं।सेहत का विज्ञान: मकर संक्रांति पर 'तिल-गुड़' का सेवन महज परंपरा नहीं, बल्कि 'खाद्य विज्ञान' है। आयुर्वेद के अनुसार, ठंड के इस मौसम में शरीर को कैल्शियम, आयरन और फैट्स की आवश्यकता होती है, जो तिल और गुड़ के मिश्रण से प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं। साथ ही, इस दिन पतंग उड़ाने की प्रथा लोगों को धूप में रहने के लिए प्रेरित करती है, जिससे शरीर को प्राकृतिक रूप से 'विटामिन-D' मिलता है।
सौर संवत: समय की गणना जो कभी नहीं थकती भारत में समय की गणना के लिए 'सौर संवत' और 'चंद्र संवत' दोनों का प्रयोग होता है। जहाँ दिवाली और होली चंद्रमा की कलाओं पर आधारित हैं, वहीं मकर संक्रांति पूरी तरह से सौर संवत पर टिकी है। भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर 'शक संवत' एक शुद्ध सौर संवत है। इसकी स्थापना 78 ईस्वी में कुषाण वंश के महान सम्राट कनिष्क ने की थी। सौर संवत की विशेषता यह है कि यह ऋतुओं के साथ सीधा तालमेल रखता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति की तारीख ग्रेगोरियन कैलेंडर (अंग्रेजी कैलेंडर) में लगभग निश्चित रहती है, जबकि अन्य त्यौहार आगे-पीछे होते रहते हैं। सतयुग से कलियुग तक की गाथा में।मकर संक्रांति का इतिहास केवल कुछ सदियों पुराना नहीं, बल्कि इसका वर्णन चारों युगों के ग्रंथों में मिलता है: पुराणों के अनुसार, सतयुग में इसी दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर आतंक मचाने वाले असुरों का संहार कर उनके सिरों को मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया था। यह दिन अधर्म पर धर्म की जीत का पहला बड़ा पर्व बना। त्रेतायुग युग में सूर्यवंशी राजा भगीरथ की तपस्या सफल हुई थी। मकर संक्रांति के दिन ही माँ गंगा शिव की जटाओं से निकलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। आज भी बंगाल के गंगासागर में 'सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार' की कहावत इसी इतिहास को दोहराती है। द्वापरयुग में महाभारत काल में भीष्म पितामह ने बाणों की शय्या पर लेटे हुए 58 दिनों तक केवल इसलिए मृत्यु को रोके रखा क्योंकि वे उत्तरायण (मकर संक्रांति) के पवित्र दिन अपना शरीर त्यागना चाहते थे। उनकी मान्यता थी कि इस शुभ बेला में प्राण त्यागने से आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है। कलियुग (सांस्कृतिक संगम): आज के कलियुग में यह त्यौहार भारत की 'अनेकता में एकता' का प्रतीक है। उत्तर भारत में 'खिचड़ी', पंजाब में 'माघी', गुजरात में 'उत्तरायण', असम में 'बिहु' और दक्षिण भारत में 'पोंगल' के रूप में यह पर्व एक साथ मनाया जाता है मकर संक्रांति का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप यह पर्व केवल भारत की सीमाओं में कैद नहीं है। हमारे पड़ोसी देश नेपाल में इसे 'माघे संक्रांति' कहा जाता है, जहाँ थारू समुदाय इसे विशेष उत्साह से मनाता है और वहाँ सरकार सार्वजनिक अवकाश भी देती है। दक्षिण-पूर्व एशिया में थाईलैंड का 'सोंगकरन', म्यांमार का 'थिंयान' और श्रीलंका का 'पोंगल' इसी सौर घटना के विभिन्न सांस्कृतिक संस्करण मकर संक्रांति का एक बड़ा पहलू 'दान' है। इस दिन अन्न, वस्त्र और तिल के दान को सौ गुना फलदायी माना गया है। यह पर्व सिखाता है कि जब सूर्य अपनी दिशा बदलकर सबको प्रकाश दे सकता है, तो मनुष्य को भी अपने अहंकार को त्यागकर समाज के प्रति उदार होना चाहिए। 'तिल-गुड़ घ्या, गोड़-गोड़ बोला' का संदेश हमें कड़वाहट भूलकर रिश्तों में मिठास घोलने की प्रेरणा देता है।
: मकर संक्रांति केवल एक तिथि नहीं, बल्कि हमारी गौरवशाली विरासत का एक जीवित अध्याय है। यह हमें याद दिलाता है कि हम उस संस्कृति का हिस्सा हैं जिसने हजारों वर्ष पहले ही सूर्य की गति और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझ लिया था। चाहे वह वैज्ञानिक तर्क हो या युगों का इतिहास, यह पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है।


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