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कैसे जिये...

कैसे जिये...

संजय जैन


जब भी अपने आप और समाज व देश को देखता हूँ तो बहुत ज्यादा वेदना और उत्सुकता दिल दिगाम पर छाई रहती है। जिसे सोचकर कुछ लिखने का मन होता है की हम अपनी भावनाओं को व्यक्त करे ताकि लोगों को कुछ बता सके और लोगों से कुछ सीख सके। विचारों का आदान प्रदान कर सके और लोगों की वेदना का हल और उसे कम कर सके। यह हम और आप एक दूसरे से मिल जुलकर ही कर सकते है। इसलिए सभी को देश समाज और घर में व्यवहारिक और मिलनसार होना बहुत जरूरी है। इससे ही हम सब को खुशियाँ और आपार आनंद की अनुभूति मिलती है दिगाम् से बेकार की चिंताओं का अंत होता है और हमें बेकार की बीमारियों से मुक्ति मिलती है। बीमारी की जड़ हमारी चिंताएं होती है जो हमारे शरीर के साथ दिल दिमाग आदि पर घर करती है और हमारी जीने की इच्छा शक्ति भी छिड़ होती जाती है। इसलिए चिंता मुक्त रहना और अपनी चिता का समय पूर्व न होकर पूर्ण आयु तक जी सकता है जितनी आयु उसे विधाता ने लिखकर दी। इसलिए हम सब को मिल जुलकर एक साथ रहना आज की दौड़ भाग भरी जिंदगी में बहुत जरूरी है। हर किसी को पेट की भूख मिटाने के लिए भगाना पड़ता है। तब जाकर दो वक्त का खाना लोगों को नसीब होता है। परंतु जिंदगी को जीने का आनंद संघर्ष बिना बहुत अधूरा होता है और संघर्ष करने और अपनी जीत पक्की करने के लिए सब का साथ बहुत जरूरी है। इसलिए आपसी भाईचारा का होना भी बहुत आवश्यक है। हमारी एक जुटता बड़े बड़े कामों को यूही हल कर सकती है। इसलिए खंड खंड रहने की अपेक्षा संयुक्त रहना आज के युग में बहुत ही जरूरी है।
जीत का, कामयाबी का, और चिंता मुक्त रहने का मूल मंत्र है, हमारी मिलने मिलाने की भावनाएँ और हमारी व्यहारिकता ही है। जिसके कारण हम और आप हँसी खुशी से जीवन जी सकते है और सफलता की शिखर तक पहुँच सकते है। जीवन को बिना परेशानियों और चिंताओं के बिना जिये।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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