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भारत श्रीलंका और हिंदमहासागर की सांस्कृतिक समन्वय

भारत श्रीलंका और हिंदमहासागर की सांस्कृतिक समन्वय

सत्येन्द्र कुमार पाठक
इतिहास की पुस्तकें हमें बताती हैं कि सभ्यताएं नदियों के किनारे फली-फूलीं, लेकिन संस्कृतियों का विस्तार महासागरों की लहरों पर हुआ। 13 जनवरी 2026 की सुनहरी सुबह, जब कोलंबो स्थित हिंद महासागर के तट पर सूर्य की पहली किरणें बिखरीं, तो एक नया इतिहास रचा जा रहा था। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी द्वारा आयोजित 'लेखक मिलन समारोह' के दौरान भारतीय साहित्यकारों के एक दल ने न केवल श्रीलंका की धरती पर कदम रखा, बल्कि हिंद महासागर के जल में प्रतीकात्मक गोता लगाकर भारत और श्रीलंका के बीच के 2500 वर्ष पुराने संबंधों को शब्दों का नया आकाश दिया। इस दल का नेतृत्व कर रहे थे वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्र कुमार पाठक, अकादमी के संयोजक डॉ. अकेला भाई, स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव और कवयित्री डॉ. संगीता सागर है। साहित्यकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक ने कहा कि यह आयोजन केवल एक साहित्यिक गोष्ठी नहीं थी, बल्कि यह 'सांस्कृतिक कूटनीति' का एक उत्कृष्ट उदाहरण था, जहाँ कलम के सिपाहियों ने समंदर की लहरों के माध्यम से दो देशों के दिलों को जोड़ने का उपक्रम किया। कोलंबो: जहाँ इतिहास करवट लेता है कोलंबो, जिसे दुनिया 'हिंद महासागर का मोती' कहती है, वास्तव में एक ऐसा चौराहा है जहाँ समय की कई परतें एक साथ मौजूद हैं। एक ओर उत्तर में कोलंबो बंदरगाह की आधुनिकता और दूसरी ओर बेइरा झील के शांत लैगून के बीच बसा यह शहर दक्षिण एशिया की समुद्री पहचान का केंद्र है। ऐतिहासिक रूप से, कोलंबो सदियों तक मसालों, रत्नों और बौद्धिक चेतना का केंद्र रहा। अरब व्यापारियों से लेकर यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों तक, हर किसी ने इस 'मोती' को पाने की चाह रखी। आज, जब हम यहाँ के 'फोर्ट एरिया' या 'गंगारामया मंदिर' की गलियों में टहलते हैं, तो हमें पुर्तगाली, डच और ब्रिटिश वास्तुकला के साथ-साथ शुद्ध श्रीलंकाई परंपराओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह वही 'समुद्री सिल्क रोड' है जिसने कभी बुद्ध के संदेशों को वैश्विक बनाया था।
साहित्यकार सत्येन्द्र कुमार पाठक का वैचारिक विमर्श इस यात्रा के केंद्र बिंदु रहे वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्र कुमार पाठक। समारोह के दौरान उनके संबोधन ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। पाठक जी ने तर्क दिया कि भारत और श्रीलंका का संबंध केवल भौगोलिक निकटता का नहीं, बल्कि 'सांस्कृतिक डीएनए' का है।
उन्होंने रेखांकित किया कि कैसे प्राचीन व्यापारिक हवाओं ने न केवल जहाजों को दिशा दी, बल्कि ज्ञान, दर्शन और कला का भी वहन किया। उनके अनुसार, "हिंद महासागर का जल हमारे बीच की दीवार नहीं, बल्कि वह दर्पण है जिसमें भारत और श्रीलंका एक-दूसरे का अक्स देखते हैं।" पाठक जी का यह दृष्टिकोण आधुनिक संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है, विशेषकर जब दक्षिण एशियाई देश अपनी साझा पहचान को फिर से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। संयोजन की शक्ति: डॉ. अकेला भाई और स्वर्णिम कला केंद्र किसी भी अंतरराष्ट्रीय आयोजन की सफलता उसके पीछे की संगठनात्मक दूरदृष्टि पर निर्भर करती है। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के संयोजक डॉ. अकेला भाई ने जिस कुशलता से इस लेखक मिलन समारोह को संयोजित किया, उसने हिंदी साहित्य के वैश्विक विस्तार को एक नई दिशा दी है। वहीं, डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव और डॉ. संगीता सागर की उपस्थिति ने इस आयोजन को भावुकता और काव्यात्मक ऊँचाई प्रदान की। डॉ. श्रीवास्तव ने 'हिंद महासागर की पहचान' को पुनर्जीवित करने पर बल देते हुए कहा कि समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ 'सांस्कृतिक सुरक्षा' भी आज की महती आवश्यकता है। इन साहित्यकारों का हिंद महासागर के सानिध्य में समय बिताना इस बात का प्रतीक था कि भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी महासागर की तरह विशाल और समावेशी है। हिंद महासागर: सामरिक महत्व और सांस्कृतिक पहचान आलेख का एक महत्वपूर्ण पहलू इस क्षेत्र का सामरिक महत्व भी है। कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन (CSC) जैसे मंचों ने आज हिंद महासागर को सुरक्षा और सहयोग का नया केंद्र बना दिया है। भारत, श्रीलंका, मालदीव और अब पूर्ण सदस्य के रूप में सेशेल्स की भागीदारी इस क्षेत्र को वैश्विक शक्तियों की प्रतिस्पर्धा से बचाकर एक 'स्थिरता का क्षेत्र' बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन साहित्यकारों का मानना है कि यह सुरक्षा केवल नौसैनिक जहाजों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान से भी आएगी। जब भारत और श्रीलंका के लेखक एक-दूसरे की भाषाओं और संवेदनाओं को समझेंगे, तो क्षेत्रीय शांति की नींव और अधिक सुदृढ़ होगी। भारतीय यात्रियों के लिए एक किफ़ायती स्वर्ग पर्यटन की दृष्टि से देखा जाए तो श्रीलंका भारतीयों के लिए हमेशा से एक पसंदीदा गंतव्य रहा है। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, श्रीलंका भारतीयों के लिए सबसे सस्ते और सुंदर यात्रा गंतव्यों में से एक है।
खान-पान: यहाँ का 'इस्सो वडाई' (झींगे के पकौड़े) और स्ट्रीट फूड न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि भारतीय जायके के काफी करीब है। गॉल फेस ग्रीन पर सूर्यास्त देखना और पतंगों से भरे आकाश के नीचे समुद्र की लहरों का संगीत सुनना एक आध्यात्मिक अनुभव की तरह है। जुड़ाव: 2500 साल पुराना साझा इतिहास हर कदम पर भारतीय यात्री को अपनेपन का अहसास कराता ह कोलंबो में आयोजित यह लेखक मिलन समारोह एक गूँज की तरह है जो आने वाले लंबे समय तक सुनी जाएगी। यह आयोजन बताता है कि "सूर्यास्त को सहारा मानकर पानी के किनारे रहना" केवल एक काव्य पंक्ति नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है। हम हमेशा पानी के किनारे रहते आए हैं, और हमारा मुख हमेशा पश्चिम की ओर रहा है, जहाँ से ज्ञान और व्यापार की नई किरणें आती हैं। श्रीलंका को 'हिंद महासागर का मोती' इसलिए नहीं कहा जाता कि वह सुंदर है, बल्कि इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह समुद्र की गहराइयों से निकली उस संस्कृति को संजोए हुए है, जिसमें भारत का प्रेम और विश्व कल्याण की भावना समाहित है। सत्येन्द्र कुमार पाठक और उनके साथियों की यह यात्रा इसी प्रेम और समन्वय की विजय गाथा है।


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