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वसुधैव कुटुंबकम्: विश्व के सारे देश एक हों

वसुधैव कुटुंबकम्: विश्व के सारे देश एक हों

✍️ डॉ.अंकेश कुमार
हद हो गई। कोई देश किसी देश के नायक को सोए में उठा ले।
डकैती कर उसके संसाधन कब्जा ले।
टैरिफ अनाप शनाप बढ़ा दे। अत्याधुनिक हथियार नागरिकों को मारने में उपयोग करे।
संहारक युद्ध हथियार बेच डाले और वहीं किसी देश को यह कह कर तबाह करे कि तुम तकनीकी का उपयोग विध्वंसक हथियार के निर्माण में कर रहे हो इसलिए तुमसे हम पहले ही डर गए और आत्मरक्षा में तुम्हे नष्ट कर रहे हैं।
वाह रे नीच मानसिकता।
विश्व को इस दोहरी मानसिकता से निजात चाहिए।
दोहरी मानसिकता की बलि देनी ही होगी।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) (Article 2(4)) सभी सदस्य देशों को अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में किसी अन्य राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग (force) या धमकी देने से रोकता है। यह वैश्विक शांति बनाए रखने का मुख्य नियम है, और इसका उल्लंघन तभी मान्य है जब वह आत्मरक्षा या सुरक्षा परिषद द्वारा अधिकृत हो।
प्रमुख उल्लंघन के उदाहरण:
सशस्त्र आक्रामक कार्रवाई: किसी दूसरे देश की संप्रभुता का हनन करते हुए हमला करना।
क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन: दूसरे देश के सीमा या क्षेत्र में बलपूर्वक प्रवेश।
धमकी देना: बल प्रयोग का डर दिखाकर अनुचित दबाव बनाना।
प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग के अनुसार, उपग्रहों को नष्ट करने जैसी कार्रवाई भी उल्लंघन हो सकती है।


संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश की भूमिका
क्या होनी चाहिए?
सुरक्षा परिषद में बैठे देश यू एस ए, रूस, चीन , इंग्लैंड और फ्रांस की सदस्यता के ऊपर इस हद तक की निष्क्रियता पर सवाल कौन उठाएगा?

संयुक्त राष्ट्र (UN) के 193 सदस्य देश और 2 गैर-सदस्य पर्यवेक्षक देश (वेटिकन सिटी और फ़िलिस्तीन) क्या कुछ देशों की सनक को यूं ही बर्दाश्त करते रहेंगे?
अपनी संप्रभुता, अपने नागरिकों के जीवन को शहादत की बलि बेदी पर यूं ही निसार कर देंगे।
क्या ये पृथ्वी नाम का ग्रह चंद स्वार्थी, घमंडी और दुष्ट देश की बनाई हुई है क्या कि गाहे बगाहे उसका अतिक्रमण विश्व झेलता रहे?
जितनी बड़ी घटना हो रही है उतना तो 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ के संविधान पर हस्ताक्षर करने वाले कोई 50देशों ने तो इतनी नीच हरकत के बारे में सोचा भी नहीं था।
मानवाधिकार का हनन, जीवन का क्षरण, जो बचे हैं उनके आत्मसम्मान का हरण करने की सामंती और आनुवांशिक औपनिवेशिक पिशाचक सोच वाली पगलाई मति गति का घेराव कर उन्हें जड़मूल से नष्ट किया जाना परम आवश्यक है।विश्व के तमाम देश जरा सोचिए।
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