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अंग अंग हुआ मलंग,होली के रंग में

अंग अंग हुआ मलंग,होली के रंग में

कुमार महेंद्र
लोक छटा मोहक_सोहक,
सर्वत्र आनंद अठखेलियां ।
प्रेम बसंती चरम_ बिंदु,
सुलझ रही अबूझ पहेलियां ।
रग_रग अंतर यौवन उभार,
जीवन मस्त उत्साह उमंग में ।
अंग अंग हुआ मलंग,होली के रंग में ।।


संबंध पटल अपनत्व प्रवाह,
सारे गिले शिकवे समूल दूर ।
निर्वहन परा परंपरा संस्कार,
परस्पर आदर सत्कार भरपूर ।
धूमिल वैमनस्य उग्र आवेश,
खुशियां निर्झर जन उत्संग में ।
अंग अंग हुआ मलंग,होली के रंग में ।।


हंसी ठिठोली मय संवाद,
लोक नृत्यों संग थिरकन ।
नयन पटल अविरल नेह वृष्टि,
प्रिय चाहना हृदय धड़कन ।
मद_मस्त जीवन अठखेलियां,
अल्हड़_झूम धमाल ढप चंग में ।
अंग अंग मलंग हुआ,होली के रंग में ।।


धराशाही हिरण्यकश्यप सोच,
कदम चाल प्रह्लाद भक्ति ओर ।
सत्य पथ गमन दृढ़ संकल्प,
बुराई अस्त प्रयास पुरजोर ।
रज रज पुनीत शुभ_मंगल,
तन मन मस्त फाल्गुनी हुड़दंग में ।
अंग अंग हुआ मलंग,होली के रंग में ।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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