बिहार में रंगों, आध्यात्म और उल्लास का अद्भुत संगम दिखा- “होली”
दिव्य रश्मि के उपसम्पादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से |
भारतवर्ष में मनाया जाने वाला होली का पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की आत्मा में रचा-बसा एक आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन है। वर्ष 2026 में देशभर में होली 3 और 4 मार्च को दो दिन मनाई गई। बिहार में यह पर्व 4 मार्च को अत्यंत उल्लास, उत्साह और शांति के साथ सम्पन्न हुआ।
राजधानी पटना से लेकर छोटे कस्बों और गांवों तक रंगों की फुहारें, अबीर-गुलाल की सुगंध, ढोल-नगाड़ों की थाप और लोकगीतों की मधुरता वातावरण में घुली रही।
4 मार्च की सुबह से ही पटना की गलियां रंगमय हो उठीं। कदमकुंआ, पीरमुहानी, कंकड़बाग, आशियाना, दानापुर, गर्दनीबाग, बिहटा, कोरहर और दीघा जैसे क्षेत्रों में लोग छोटी-छोटी टोलियों में निकल पड़े। लोग अपने परिचितों और रिश्तेदारों के घर जाकर रंगों से सराबोर करते दिखे। “धुरखेली” की परंपरा के तहत लोग एक-दूसरे पर रंग डालते हुए गले मिलते रहे।
दोपहर बाद रंगों की मस्ती चरम पर रही, जबकि संध्या होते-होते लोग स्नान कर नए वस्त्र पहनकर गुलाल के साथ शांतिपूर्ण होली खेलने निकले। घर-घर में गुजिया, मालपुआ, दहीबड़ा और ठंडाई का स्वाद लिया गया।
इस वर्ष की विशेष बात रही कि होली पूर्णतः शांतिपूर्ण माहौल में सम्पन्न हुई। प्रशासन और आम जनता दोनों की सजगता ने इस पर्व को सौहार्दपूर्ण बनाया।
आशियाना-दीघा निवासी डॉ. सर्वेश कुमार के अनुसार, होली का अर्थ केवल रंगों से खेलना नहीं है। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। होली सिखाती है दुष्प्रवृत्तियों का त्याग, अमंगल विचारों का नाश, अनिष्ट शक्तियों का दहन और ईश्वरीय चैतन्य की प्राप्ति। होलिका दहन इसी आध्यात्मिक संदेश का प्रतीक है, जहाँ अहंकार और अत्याचार का अंत होता है और भक्ति तथा सत्य की जीत होती है।
अभियंता प्रशांत कुमार सिन्हा बताते हैं कि होली का संबंध मनुष्य के व्यक्तित्व, प्रकृति और मानसिक संतुलन से भी है। वसंत ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति नवजीवन प्राप्त करती है। खेतों में फसलें लहलहाती हैं। किसान खुशहाल होता है। इस समय अग्नि देवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह पर्व साधना में अग्रसर होने की ऊर्जा देता है। रंगों के माध्यम से जीवन में उल्लास और सकारात्मकता का संचार होता है।
बीएचयू की छात्रा रही सुरभि सिन्हा ने काशी की होली की विशेष परंपरा का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि काशी में मान्यता है कि काशीपुराधिपति भगवान महादेव रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती का गौना करवाने आते हैं। इस अवसर पर बाबा विश्वनाथ माता गौरा को लेकर टेढ़ी नीम से श्रीकाशी विश्वनाथ धाम तक शोभायात्रा निकालते हैं। औघड़ संत चिता भस्म से होली खेलते हैं। वे गाते हैं “भूत पिशाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी।” यह दृश्य आध्यात्मिक और रहस्यमय दोनों होता है। शिव तांडव की मुद्रा में नृत्य करते संत जीवन और मृत्यु के अद्वैत का संदेश देते हैं।
उन्होंने बताया कि रविंद्रपुरी स्थित क्रीं कुंड से हरिश्चंद्र घाट तक विशाल शोभायात्रा निकलती है, जिसमें महिलाएं और स्थानीय लोग सक्रिय भागीदारी करते हैं। यह परंपरा बताती है कि होली केवल रंगों का खेल नहीं है, बल्कि मृत्यु और जीवन के दर्शन का पर्व भी है।
आशियाना-दीघा निवासी आभा सिन्हा बताती हैं कि इस बार भी लोगों ने अपने-अपने घरों की छतों और आंगनों में परिवार सहित होली खेली। उन्होंने बताया कि विशाल आदित्य अपार्टमेंट की छत पर सामूहिक होली खेली गई। इसमें अनंत कुमार सिन्हा, अद्विक, मोनिका केसरी, ए.के. जैन, श्रीमती जैन, उनकी पुत्री, सर्वेश, गोलू, सुरभि, नवलेश शर्मा अपनी पत्नी, बहू एवं पोती सहित कई लोग शामिल हुए। सामूहिकता, अपनत्व और पारिवारिक सौहार्द का यह दृश्य अत्यंत मनोहारी था।
ए के जैन ने बताया कि होली एक ऐसा पर्व है जो जाति, वर्ग, उम्र और सामाजिक भेदभाव को मिटा देता है। इस दिन सभी एक-दूसरे को गले लगाकर पुरानी कटुता भूल जाते हैं। बिहार में इस वर्ष विशेष रूप से शांति और सद्भाव का वातावरण रहा। प्रशासन की सजगता और नागरिकों की परिपक्वता ने यह साबित किया कि उत्सव को गरिमा के साथ मनाया जा सकता है।
होली के अवसर पर बिहार में विशेष रूप से बनाए जाने वाले व्यंजन में गुजिया, मालपुआ, दहीबड़ा, ठेकुआ, पापड़ी और ठंडाई प्रमुख है। लोकगीतों में फगुआ, होरी और कजरी की धुनें गूंजती रहीं। ढोलक और मंजीरे की थाप पर महिलाएं और पुरुष झूमते रहे।
4 मार्च 2026 की बिहार की होली ने यह सिद्ध किया है कि यह पर्व केवल उत्सव नहीं है, बल्कि जीवन का दर्शन है। जहाँ एक ओर पटना की गलियों में रंगों की मस्ती थी, वहीं काशी की मसाने की होली जीवन-मृत्यु के रहस्य को उजागर कर रही थी। “भूत पिशाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी” यह पंक्ति याद दिलाती है कि होली केवल रंगों का खेल नहीं है, बल्कि वैराग्य, समर्पण और आनंद का उत्सव है। रंगों की इस पावन छटा में बिहार ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि संस्कृति, परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम ही भारत की पहचान है।
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