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पतंग

पतंग

अरुण दिव्यांश
उड़ उड़ री तू पतंग ,
जीवन तुम सा जंग ।
नभ तुझे देख दंग ,
वायु में दिखाते रंग ।।
तेरी मेरी एक कहानी ,
जीवन मेरा है राजा ,
आयु उसकी है रानी ।
भाग्य उसका है दास ,
कर्म उसकी नौकरानी ।।
तुममें मुझमें फर्क यही ,
मैं पीता हूॅं खूब पानी ।
तुम्हें पानी से चिढ़ है ,
जल से खत्म जिंदगानी ।।
हवा संग तू खूब लड़ती ,
मात कभी नहीं खाती है ।
फटे या गिरे नहीं तबतक ,
अपना रंग तू दिखाती है ।।
शौक विशेष संक्रांति का ,
नववर्ष जलवा दिखाती है ।
काट पेंच का काट चलता ,
बच्चों को विशेष भाती है ।।
तुमसे ही मैं उड़ना सीखा ,
जब दुनिया ही की तंग है ।
हार हारकर गिरता उठता ,
तुझे देख जागा उमंग है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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