वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?
अध्याय ९
देशभक्ति का प्रतीक बन गया था " वंदे मातरम"
डॉ राकेश कुमार आर्य
मातंगिनी हाजरा हमारे स्वाधीनता आंदोलन की क्रांतिकारी विचारधारा की एक ऐसी वीरांगना का नाम है जिन्होंने अंग्रेजों को हिला कर रख दिया था। उनका जन्म पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के होगला नामक ग्राम में हुआ था। उनका प्रारंभिक और वैवाहिक जीवन कई प्रकार की विषमताओं से घिरा हुआ था। इसके उपरांत भी वह समाज में अपना सम्मान पूर्ण स्थान बनाने में सफल हुई थीं। उनके भीतर राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भरा हुआ था। देश सेवा का उनका आदर्श भाव देखते ही बनता था।
बात सन १९३१- ३२ की है। जब देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। गांधी जी के द्वारा चलाये गये इस आंदोलन में लोग जुलूस निकालते थे। जिसमें ' वंदे मातरम' का जय घोष किया जाता था। ' वंदे मातरम ' के इस जय घोष ने मातंगिनी हाजरा को बहुत अधिक प्रभावित किया।
इस जयघोष को सुनकर मातंगिनी हाजरा इतनी अधिक भाव विभोर हुईं कि उन्होंने शंखध्वनि से जुलूस का स्वागत किया। यहीं से उनके जीवन में एक ऐसा परिवर्तन आया जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। वे 'वंदे मातरम' का जय घोष करते आ रहे जुलूस के साथ चल पड़ीं। उन्हें कहां जाना था ? - उस दिन तो वह स्वयं भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानती थीं।
मातंगिनी हाजरा ने लिया निर्णय
जुलूस में सम्मिलित लोगों का उत्साह देखते ही बनता था। उनकी देशभक्ति उनके सिर चढ़कर बोल रही थी। कुछ दूर चलकर यह जुलूस तामलुक के कृष्णगंज बाजार में जाकर रुका। जहां एक सभा में परिवर्तित हो गया। इस सभा में कई क्रांतिकारी भाषण हुए। जिन्होंने मातंगिनी हाजरा को और भी अधिक प्रभावित किया। तब उन्होंने अपने देश के इस क्रांतिकारी आंदोलन में कूदकर सहभागी होने का निर्णय लिया। मातंगिनी हाजरा के जीवन में यदि ' वंदे मातरम' से इतना भारी परिवर्तन आ सकता था तो आप अनुमान लगा सकते हैं कि इसने उन जैसी अन्य कितनी वीरांगनाओं को देश के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने की प्रेरणा दी होगी ? इसी प्रकार कितने देशभक्त वीर योद्धाओं को देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा इस गीत ने दी होगी ? - यह भी विचार करने की आवश्यकता है।
कहा जाता है कि मातंगिनी हाजरा को अपने व्यक्तिगत जीवन में अफीम का चस्का लग गया था। परंतु जब वह ' वंदे मातरम' की शरण में आईं तो अब उन पर दूसरा ही नशा सवार हो गया था । ...और वह नशा था- देश की स्वाधीनता का नशा। अब उन्हें सोते-जागते, उठते-बैठते देश की स्वाधीनता के ही सपने आते थे। ऐसा चमत्कारिक प्रभाव उन पर 'वंदेमातरम' का हुआ था। जब जनवरी १९३३ में करबंदी आंदोलन का दमन करने के लिए बंगाल के तत्कालीन गवर्नर एंडरसन तामलुक आए तो कई लोगों ने ' वंदेमातरम' के दीवाने हुए कई लोगों ने उस अंग्रेज अधिकारी का विरोध करने का निर्णय लिया। फलस्वरुप तामलुक में उनके पहुंचते ही विरोध प्रदर्शन होने आरंभ हो गए। उन प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व करने वाली मातंगिनी हाजरा सबसे आगे झंडा लेकर चल रही थीं। वह ' वंदे मातरम' बोलती जा रही थीं और उतने ही उत्साह के साथ उनके अन्य साथी ' वंदे मातरम' का जयघोष करते जा रहे थे। ' वंदे मातरम' का जय घोष करती जा रही मातंगनी हाजरा को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। ६ महीने का कठोर कारावास देने का निर्णय हुआ। फलस्वरूप उन्हें मुर्शिदाबाद जेल भेज दिया गया।
' भारत छोड़ो आंदोलन' और मातंगिनी हाजरा
सन १९४२ के ' भारत छोड़ो आंदोलन' के समय भी मातंगिनी हाजरा ने अपनी वीरता और देशभक्ति का परिचय दिया। उन्होंने अपने प्राणों की चिंता किए बिना अंग्रेजों के विरोध में उतरकर नारी शक्ति को उनके विरुद्ध खड़ा होने की प्रेरणा देना आरंभ किया। १९४२ के 'भारत छोड़ो आंदोलन' को इतिहास में 'अगस्त क्रांति ' के नाम से भी जाना जाता है। इसमें हमारे अनेक क्रांतिकारियों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा था। ८ सितंबर को अंग्रेजों की गोली से तीन प्रदर्शनकारी स्वाधीनता सेनानी मारे गए। इससे आंदोलन और भी अधिक तीव्र हो गया। यद्यपि अंग्रेज गोली चलाकर ऐसा प्रभाव डालने का प्रयास करते थे कि उनकी गोली का सामना करने के लिए कोई भारतीय सामने नहीं आएगा। परंतु वह जितना ही अधिक गोली या गोला बारूद का सहारा लेते थे, भारत के लोग उतना ही अधिक अनुपात में सड़कों पर उतर आते थे।
८ सितंबर की इस घटना से लोग इतने अधिक उत्तेजित हुए कि उन्होंने २९ सितंबर को और भी बड़ा आंदोलन करने और बड़ी रैली निकालने का निर्णय लिया। ' वंदे मातरम' से लोगों को प्रेरणा मिलती थी और जितने उत्साह के साथ वह इसे बोलते थे, उतना ही अधिक उनके भीतर ऊर्जा का संचार हो जाता था। मातंगिनी हाजरा पूर्ण समर्पण के साथ सड़कों पर उतर आई थीं। अपने तीन स्वाधीनता सेनानियों की निर्मम हत्या ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। अब उन्होंने भारत के गांव देहात तक पहुंचकर लोगों को देश सेवा के लिए जगाने का संकल्प ले लिया था।
हाजरा मातंगिनी ने गांव-गांव अनेक सभाओं का आयोजन किया और ५००० लोगों को ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध आवाज लगाने के लिए तैयार किया। ' वंदे मातरम' का जय घोष करते हुए वे इस विशाल जन समूह के साथ सरकारी डाक बंगले पर पहुंच गईं। वहां पर पुलिस बल भारी संख्या में तैनात कर दिया गया था। इसलिए यह निश्चित था कि पुलिस से इन सभी स्वाधीनता सेनानियों की तकरार हो। मातंगिनी स्वयं इस जुलूस का नेतृत्व कर रही थीं। पुलिस बल से वह तनिक भी विचलित नहीं हुईं और सरकारी डाक बंगले के पास जाकर वह एक चबूतरे पर खड़ी होकर ज़ोर से ' वंदे मातरम' बोलते हुए लोगों के भीतर उत्साह भरने का कार्य निरंतर करती रहीं। तब पुलिस ने उन पर गोली चला दी। पुलिस की गोली उनके बाएं हाथ में लगी। जबकि दूसरी गोली उनके दाहिने हाथ में लगी और तीसरी उनके माथे पर लगी। अंतिम क्षणों में भी ' वंदे मातरम' बोलते हुए उन्होंने अपना बलिदान दिया।
मैडम भीखाजी कामा और "वन्दे मातरम्"
मैडम भीकाजी कामा भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा थीं। उन्होंने १९०७ में जर्मनी के स्टुटगार्ट में ' वंदे मातरम' लिखा हुआ पहले तिरंगा बनाया। यह वही वर्ष था, जब क्रांतिवीर सावरकर जी ने सन १८५७ की क्रांति को भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम घोषित करते हुए विदेश में रहते हुए पुस्तक लिखी और उनके द्वारा १८५७ की क्रांति के अर्धशताब्दी समारोह का आयोजन विदेश की भूमि पर किया गया था। हम सभी जानते हैं उससे कुछ समय पहले ही बंग- भंग की घटना हुई थी। जिसको लेकर सारा देश उबल रहा था। इन सब घटनाओं में ' वंदे मातरम' हमारा नेतृत्व कर रहा था। लोग एकत्र होते तो ' वंदे मातरम' गाया जाता और जुलूस निकालते तो ' वंदे मातरम' का जय घोष करते चलते थे।
कुल मिलाकर उस समय भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की श्वासों में ' वंदे मातरम' रम गया था। यही कारण था कि मैडम भीकाजी कामा ने जब १९०७ में भारत का पहला तिरंगा बनाया तो उसमें उन्होंने ' वंदे मातरम' लिखा था। इस झंडा में उन्होंने लाल, पीला और हरा रंग भरा था। इसीलिए इसको तिरंगा नाम दिया गया था। मैडम भीकाजी कामा ने अपने इस तिरंगा में ८ कमल के फूल सूर्य, चंद्रमा और बीच में ' वंदे मातरम' देवनागरी लिपि में लिखकर भारत के स्वाधीनता आंदोलन को नई दिशा और नई गति प्रदान की थी। देश के क्रांतिकारियों ने मैडम भीकाजी कामा के इस झंडे का हार्दिक स्वागत किया था। मैडम कामा ने अपने इस तिरंगा को जर्मनी के स्टुटगार्ट में आयोजित किए गए अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में प्रथम बार फहराया था। इस प्रकार १९०७ में ही ' वंदे मातरम' के इस तिरंगा ने संसार भर के समाजवादियों और बुद्धिजीवियों को यह संदेश दे दिया था कि भारत अपने आप में एक स्वाधीन राष्ट्र है । जिसका अपना झंडा है। अंग्रेजों के शासनकाल में इस प्रकार की घटना को अंजाम देना बहुत बड़ी बात थी। मैडम भीकाजी कामा ने इस झंडे को बनाकर और फिर उसके पश्चात इसे फहराकर वीरता और शौर्य का परिचय दिया था। उनकी देशभक्ति आज भी हम सबके लिए वंदनीय है।
आर्य प्रिंटिंग प्रेस लाहौर और ' वंदे मातरम '
आर्य समाज ने भारत के राष्ट्रवादी क्रांतिकारी आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। स्वामी दयानंद जी पहले ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिन्होंने स्वराज्य का चिंतन राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों को दिया था। क्रांतिकारियों ने स्वामी जी के उस चिंतन को लेकर उसका व्यापक विस्तार किया। वास्तव में उन दिनों स्वामी जी के क्रांतिबीज रूपी विचारों का विस्तार करना एक ऐसे राष्ट्रीय - यज्ञ का प्रतीक बन गया था, जिसमें ' वंदे मातरम' की आहुति यज्ञ की सुगंध को हजारों गुणा बढ़ाने का काम कर रही थी। लाहौर की ' आर्य प्रिंटिंग प्रेस' ' वंदे मातरम ' के लिए काम कर रही थी। राष्ट्र के जागरण के लिए काम कर रही थी। राष्ट्र के क्रांतिकारी आंदोलन में गुणात्मक वृद्धि करने के लिए दिन-रात काम कर रही थी। ' आर्य प्रिंटिंग प्रेस ' लाहौर और देहरादून के भारतीय प्रेस ने १९२९ ईस्वी में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की पुस्तक " क्रांति गीतांजलि " को छापने का साहसिक कार्य कर दिखाया था। उन दिनों क्रांतिकारियों के लिए इस प्रकार की विशेष सामग्री को छापना साहसिक कार्य ही माना जाता था। क्योंकि ब्रिटिश सरकार ऐसी सामग्री छापने वाले लोगों के विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही करती थी।
रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी इस पुस्तक में प्रारंभ में ही ' वंदे मातरम' के चांद का निशान दिया था। जिससे स्पष्ट है कि ' वंदे मातरम' हमारे महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल जी को किस सीमा तक प्रभावित कर गया था ? राम प्रसाद बिस्मिल और उनके क्रांतिकारी साथी उस समय देश के युवाओं के लिए आदर्श बन चुके थे। ब्रिटिश सरकार भली प्रकार जानती थी यदि बिस्मिल जी की यह पुस्तक देश के युवाओं के पास पहुंच गई तो इसका परिणाम क्या होगा ? यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार ने इस पुस्तक को प्रतिबंधित कर दिया।
ध्यान रहे कि लाहौर की ' आर्य प्रिंटिंग प्रेस' ने क्रांतिकारी साहित्य के प्रकाशन करने में अपनी सारी ऊर्जा लगा दी थी। इस प्रेस के संस्थापक आर्य जगत के सु्ख्यात प्रकाशक महाशय राजपाल थे। महाशय राजपाल जी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध मानो मोर्चा ही खोल लिया था। वह स्वामी दयानंद जी महाराज के प्रिय शिष्य थे। यही कारण था कि उन्होंने ' रंगीला रसूल ' जैसी पुस्तक लिखकर इस्लाम की पोल खोलने का भी काम किया था। जिसके कारण उन्हें अपना बलिदान भी देना पड़ा था।
महाशय राजपाल जी जैसे निर्भीक, निडर, देशभक्त आर्य समाजी लोगों के कारण ब्रिटिश सरकार थर - थर काँपती थी। वह अच्छी प्रकार जानती थी कि जिस कार्य को कोई नहीं कर पाएगा, उसे कोई भी आर्य समाजी कर सकता है। रामप्रसाद बिस्मिल जी भी आर्य समाज के साथ गहराई से जुड़े हुए थे। इसी प्रकार उनके कई अन्य क्रांतिकारी साथी भी आर्य समाज की विचारधारा से ओतप्रोत थे। यही कारण था कि उन्होंने निर्भीकता के साथ अपनी उपरोक्त पुस्तक लिखी और उस पुस्तक का निर्भीकता के साथ ही महाशय राजपाल जी की ' आर्य प्रिंटिंग प्रेस' लाहौर ने प्रकाशन किया।
राम प्रसाद बिस्मिल जी की देशभक्ति असंदिग्ध थी। बिस्मिल जी की दृष्टि में ' वंदे मातरम' हमारी राष्ट्रवादी भावना का प्रतीक था। जिसका उद्घोष मां भारती के प्रति असीम प्रेम और श्रद्धा को प्रकट करता था। उनकी मान्यता थी कि राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए ' वंदे मातरम ' हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकता है। जिसका उद्घोष हम सबके भीतर अपनी मातृभूमि के प्रति असीम अनुराग उत्पन्न करता है।
वह आजीवन मातृभूमि और ' वंदे मातरम' के प्रति समर्पित रहे। जब उन्हें अंग्रेजों ने फांसी की सजा दी तो उस समय भी उन्होंने ' वंदे मातरम' का उद्घोष करते हुए फांसी के फंदे को सहर्ष चूम लिया था। उनका अनुकरण करते हुए उनके अन्य क्रांतिकारी साथियों ने भी फांसी के फंदे को चूमने में तनिक की संकोच नहीं किया था।
रामप्रसाद बिस्मिल जी की एक कविता हमको स्पष्ट करती है कि उन्हें अपनी मातृभूमि से कितना प्रेम था और फांसी से उन्हें तनिक भी डर नहीं लग रहा था :-
बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से,
लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से।
लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी,
तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से।
खुली है मुझको लेने के लिए आग़ोशे आज़ादी,
ख़ुशी है, हो गया महबूब का दीदार फांसी से।
कभी ओ बेख़बर तहरीके़-आज़ादी भी रुकती है?
बढ़ा करती है उसकी तेज़ी-ए-रफ़्तार फांसी से।
यहां तक सरफ़रोशाने-वतन बढ़ जाएंगे क़ातिल,
कि लटकाने पड़ेंगे नित मुझे दो-चार फांसी
यह ' वंदे मातरम' ही था जिसने अशफाक उल्ला खान जैसे महान क्रांतिकारी वीर बलिदानी को इन पंक्तियों को लिखने के लिए प्रेरित किया था :-
कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएंगे,
आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।
हटने के नहीं पीछे, डरकर कभी जुल्मों से,
तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे।
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बेशस्त्र नहीं हैं हम, बल है हमें चरख़े का,
चरख़े से ज़मीं को हम, ता चर्ख़ गुंजा देंगे।
परवा नहीं कुछ दम की, ग़म की नहीं, मातम की,
है जान हथेली पर, एक दम में गंवा देंगे।
उफ़ तक भी जुबां से हम हरगिज़ न निकालेंगे,
तलवार उठाओ तुम, हम सर को झुका देंगे।
सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीका,
चलवाओ गन मशीनें, हम सीना अड़ा देंगे।
दिलवाओ हमें फांसी, ऐलान से कहते हैं,
ख़ूं से ही हम शहीदों के, फ़ौज बना देंगे।
मुसाफ़िर जो अंडमान के, तूने बनाए, ज़ालिम,
आज़ाद ही होने पर, हम उनको बुला लेंगे।
आज जो लोग ' वंदे मातरम ' को लेकर बवाल काटते हैं , उन्हें अपने इन महान क्रांतिकारियों के अपनी मातृभूमि ,राष्ट्र और ' वंदे मातरम ' के प्रति इस प्रकार के पवित्र भावों पर विचार करना चाहिए।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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