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आरक्षण : योग्यता का पोस्टमार्टम

आरक्षण : योग्यता का पोस्टमार्टम

— डॉ. राकेश दत्त मिश्र

भारत में जब भी कोई कठिन परीक्षा होती है, तो दो वर्गों में देश बँट जाता है — एक वे जो परीक्षा पास करते हैं, और दूसरे वे जो परीक्षा पास होने से पहले ही “पास” माने जाते हैं। मेहनत से आए अंक यहाँ सिर्फ अंक नहीं होते, वे एक अपराध बन जाते हैं — क्योंकि आपने ज़्यादा पढ़ लिया! 📚

अब हाल की खबर सुनिए — मेडिकल जैसे गंभीर क्षेत्र में कोई -40 अंक लाकर प्रवेश पा रहा है। पहले डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में मरीज की नब्ज देखते थे, अब शायद पहले प्रमाण-पत्र देखेंगे — “आप किस श्रेणी में आते हैं?” क्योंकि आजकल इलाज से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है आरक्षण का इतिहास जानना।

पहले सवाल होता था — “डॉक्टर साहब, आपने कहाँ से पढ़ाई की?”
अब सवाल होगा — “डॉक्टर साहब, आप कितने नंबर लाए थे… या लाना ज़रूरी नहीं था?” 😌

आरक्षण का उद्देश्य था — समाज के वंचित वर्गों को अवसर देना। बहुत सुंदर विचार था। पर अब वह अवसर नहीं, ऑटोमैटिक टिकट बन गया है — ट्रेन में बिना टिकट चढ़ने जैसा, फर्क बस इतना है कि यहाँ इंजन भी उन्हीं के हाथ में दे दिया गया है। 🚆

योग्यता आज भारत में वैसी ही हो गई है जैसे सरकारी फाइल में “तत्काल आवश्यक” लिखा होता है — सब पढ़ते हैं, कोई मानता नहीं। मेधावी छात्र दिन-रात मेहनत करता है, माँ-बाप अपनी गाढ़ी कमाई कोचिंग में उड़ाते हैं, और अंत में रिजल्ट आता है —
“आप योग्य हैं, लेकिन चयनित नहीं हैं।”
मतलब देश को आप जैसे योग्य नागरिकों की ज़रूरत तो है… पर सीट नहीं है! 🪑

मेडिकल कॉलेज में अगर -40 अंक लाने वाला डॉक्टर बनेगा, तो आने वाले समय में मरीज भी शायद यही कहेगा —
“डॉक्टर साहब, इलाज में अगर गलती हो जाए तो कोई बात नहीं, आपने आरक्षण से पढ़ाई की है — अनुभव धीरे-धीरे आ जाएगा!”
पर सवाल यह है कि प्रयोगशाला की चूहिया हम हैं या मरीज? 🐭

आज आरक्षण न्याय का औज़ार नहीं, राजनीति का हथियार बन चुका है। हर चुनाव से पहले नई जातियाँ खोजी जाती हैं — जैसे वैज्ञानिक नई प्रजाति खोजते हैं। फर्क बस इतना है कि वैज्ञानिक खोज से ज्ञान बढ़ाते हैं और नेता खोज से वोट। 🗳️

अब हालत यह है कि योग्यता को सामाजिक अपराध बना दिया गया है। अगर आप ज़्यादा नंबर ले आए, तो आप पर शक होता है —
“ज़रूर किसी सुविधा वर्ग से होंगे!”
मतलब मेहनत करना अब विशेषाधिकार बन गया है।

सबसे दुखद बात यह है कि आरक्षण उस व्यक्ति को भी कमजोर बना रहा है जिसे मजबूत करना था। जब बिना संघर्ष सफलता मिलती है, तो आत्मविश्वास नहीं, केवल प्रमाण-पत्र मिलता है। और जब प्रमाण-पत्र ज्ञान से भारी हो जाए, तब समाज खोखला होने लगता है।

आज जरूरत आरक्षण की नहीं, समीक्षा की है। क्योंकि जो व्यवस्था कभी सामाजिक न्याय की सीढ़ी थी, वही अब योग्यता के गले की फाँस बनती जा रही है। अगर यही चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ी किताबों से नहीं, कोटे से डॉक्टर बनेगी — और देश दवाइयों से नहीं, दुआओं से चलेगा। 🙏

व्यंग्य में कहें तो —
अब परीक्षा में पास होने के लिए पढ़ाई नहीं, जाति प्रमाण-पत्र की कोचिंग चाहिए।
और मेडिकल में प्रवेश के बाद स्टेथोस्कोप नहीं, संविधान की प्रति ज़्यादा काम आएगी।

आरक्षण को समाप्त करना समाधान नहीं, पर उसे अनंतकालीन पेंशन योजना बना देना भी राष्ट्रहित नहीं। सामाजिक न्याय का अर्थ योग्यता की हत्या नहीं हो सकता। वरना एक दिन ऐसा आएगा जब देश पूछेगा —
“डॉक्टर तो बहुत हैं, पर इलाज करने वाला कोई क्यों नहीं?”

लेखक डॉ. राकेश दत्त मिश्र दिव्य रश्मि के सम्पादक और सामाजिक कार्यकर्ता है |

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