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अजीत डोभाल का बयान और देश का हिंदू

अजीत डोभाल का बयान और देश का हिंदू

डॉ राकेश कुमार आर्य
अभी हाल ही में भारत के एनएसए श्री अजीत डोभाल का एक बयान आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि हमें स्वाधीनता बहुत भारी कीमत चुकाने के बाद मिली है। इसके लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत बड़े-बड़े बलिदान दिए हैं। हमने ना तो मंदिर तोड़े हैं और ना ही मंदिर लूटे हैं, हमें इतिहास का प्रतिशोध लेने के लिए तैयार रहना चाहिए।
अजीत डोभाल की राष्ट्रभक्ति का हम सभी सम्मान करते हैं। वह बहुत शांत भाव से अपने कर्तव्य भाव के प्रति समर्पित होकर राष्ट्र सेवा कर रहे हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने उन्हें सेवानिवृत्ति के पश्चात भी जिस प्रकार राष्ट्र की सेवा करने का अवसर दिया है, वह न केवल श्री डोभाल की राष्ट्रभक्ति का सम्मान है अपितु प्रधानमंत्री श्री मोदी की पारखी दृष्टि का भी प्रमाण है। श्री डोभाल ने अपने उपरोक्त बयान से स्पष्ट किया है कि हमारी आजादी किसी ' चरखा क्रांति' का परिणाम नहीं है अपितु यह रक्त की बरखा का परिणाम है । जिसके लिए बहुत सारे रक्त को हमें उसी प्रकार बहाना पड़ा जिस प्रकार बरखा यानी वर्षा ऋतु में पानी बहता है। अपने खून को पानी के भाव बहा देने की शक्ति और क्षमता रखने वाला कोई भी देश कायरों का देश नहीं हो सकता। उसे वीरों का देश कहा जाना चाहिए। विशेष रूप से ऐसा देश जिसने अपनी स्वाधीनता के लिए हजार वर्ष से अधिक तक संघर्ष किया, उसकी तो वीरता और देशभक्ति का सर्वत्र गुणगान होना चाहिए।
श्री डोभाल का यह कथन बहुत ही तार्किक और मार्मिक है कि हमने मंदिर नहीं तोड़े हैं, और ना ही मंदिर लूटे हैं अर्थात हमने सृजनात्मक शक्तियों का विध्वंस नहीं किया है, हमने उन निर्माणात्मक और सकारात्मक शक्तियों को तराशने का काम किया है जो मानवता के कल्याण के लिए कार्य करती रही हैं। मानवता के विरुद्ध कार्य करने वाली शक्तियों का हमने दमन किया है। फिर चाहे वह मोहम्मद बिन कासिम रहा हो, चाहे बाबर रहा हो और चाहे अब्दाली और नादिर शाह रहे हों।
श्री डोभाल ने जिस प्रकार हिंदू को शत्रुबोध कराने का संकेत किया है, वह बहुत ही आवश्यक है। स्वाधीनता के पश्चात जिस प्रकार हिंदू को मिटाने के लिए सर्वत्र जिस प्रकार गंभीर षडयंत्रों का ताना-बाना बुना गया वह सारा का सारा आज हिंदू मानस में उतरना चाहिए। हमें इस तथ्य को समझना चाहिए कि हिंदू का हिंदू ही शत्रु है। यद्यपि हम हिंदू को हिंदू का शत्रु न मानकर उसे कहीं बाहरी शक्तियों में खोजने का प्रयास करते रहते हैं। कभी हम पाकिस्तान को हिंदू और हिंदुस्तान का शत्रु घोषित करते हैं, तो कभी हम सोरोस को इसका दोष देते हैं। कभी हम अमेरिका, चीन जैसे देशों को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं, कभी हम ईसाइयत या इस्लाम को अपने लिए खतरनाक मानते हैं। परंतु सच यही है कि हम स्वयं ही अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं।
हम तथ्यों की पड़ताल करने से बचते हैं। यदि वास्तव में हम तथ्यपरख बुद्धि का सहारा लें तो पता चलता है कि उमर खालिद और बुरहान वानी के समर्थन में जो लोग सड़कों पर उतरने की हिमाकत करते हैं, वे हिंदू होकर भी हिंदू के ही शत्रु हैं। जिन लोगों ने कश्मीरी पंडितों के साथ होने वाले अत्याचारों पर एक दिन भी सड़कों पर उतरने का साहस नहीं किया, परंतु वही किसी आतंकवादी के मारे जाने पर न्याय की गुहार लगाते हुए दिखाई देते हैं तो पता चलता है कि ये दोगले लोग ही देश के सबसे बड़े शत्रु हैं। इन्हीं लोगों को आज बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार दिखाई नहीं दे रहे हैं।
जिन लोगों ने मीडिया के माध्यम से हमारे हिंदू योद्धाओं, संतों महात्माओं, ब्राह्मणों और ठाकुरों को या क्षत्रिय वर्ग के लोगों को विलेन घोषित करने का प्रयास किया, वह भी चंद कौड़ियों के लोभ में देश को बेचने वाले हिंदू के रूप में हिंदू के ही शत्रु हैं। जिन लोगों ने मीडिया में रहकर अपनी हिंदी भाषा को मारने का काम किया है और उसके स्थान पर उर्दू के गीतों को या अंग्रेजी को किसी भी प्रकार से प्रोत्साहित किया है या उर्दू को अपनाकर उसमें बातचीत करने पर गर्व की अनुभूति की है, वे भी भारत, भारतीयता अर्थात हिंदू और हिंदुस्तान के शत्रु हैं।
जिन लोगों ने लेखक बनकर हमारे वैदिक सत्य सनातन धर्म के हिंदू वीर योद्धाओं के इतिहास को विलुप्त करने का महापाप किया है और इसके स्थान पर विदेशी व्यभिचारी, अत्याचारी और पापचारी मुगलों, मुसलमानों या ब्रिटिश लोगों के इतिहास का महिमामंडन किया है या किसी भी प्रकार से उन्हें उचित दिखाकर पापमुक्त करने का प्रयास किया है, वे पापी भी हिंदू होकर हिंदू के शत्रु ही माने जाने चाहिए। इन तथाकथित लेखकों की दृष्टि में कभी वैदिक सत्य सनातन धर्म के मानवीय मूल्य नहीं आए। ये सारी बौद्धिक क्षमताओं को और मानवता के कल्याण के लिए अपनाए जाने वाले मूल्यों को विदेश में ही खोजते रहे। जिसने भारत के वैदिक अतीत का दिवाला निकालने का काम किया। इसलिए इन पापियों को भी भारत का शत्रु ही मानना चाहिए।
जिन लोगों ने राजनीतिज्ञ के रूप में या स्तंभलेखक के रूप में अथवा छद्म विचारक के रूप में कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार पूर्ण कृत्य के फलस्वरूप उन्हें कश्मीर घाटी छोड़ने के लिए मजबूर करने की घटनाओं को या तो उपेक्षित किया या उन्हें कम करके आंकने का पाप किया या किसी भी प्रकार से उन राष्ट्रविरोधी शक्तियों का साथ दिया, जिन्होंने कश्मीरी पंडितों को अपनी मातृभूमि छोड़ने के लिए विवश किया था, वे सारे के सारे पापी भी हिंदू विरोधी ही माने जाने चाहिए। जिन हिंदुओं ने हिंदू होकर इस पाप पर आज तक एक शब्द नहीं बोला, वे आज के समय के ' जयचंद' हैं। इन सभी ' जयचंदों' को अपने ' पृथ्वीराज' से कोई लगाव नहीं है और जिसका घर में रहकर भी घर वालों से लगाव न हो वह घर का भेदी हो सकता है, जयचंद हो सकता है, छलिया हो सकता है, दोगला हो सकता है परंतु सच्चा देशभक्त नहीं हो सकता।
जिन्होंने श्री राम के अस्तित्व को नकारा, रामसेतु के अस्तित्व को नकारा और इस संबंध में माननीय न्यायालय के समक्ष शपथ पत्र देकर भारत के सनातन इतिहास की सारी परंपराओं को पलटने का कुत्सित प्रयास किया, वे सारे यदि हिंदू भी थे तो भी वह हिंदू के शत्रु ही हैं। श्री डोभाल के वक्तव्य के संदर्भ में इन सभी तथ्यों को आज समझने की आवश्यकता है।



( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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