नाट्य-साहित्य के पुरोधा थे डा चतुर्भुज, गीत-निर्झर थे विशुद्धानंद

- डा विजय शंकर मिश्र को दिया गया 'स्मृति-सम्मान', कवियों ने दोनों साहित्य मनीषियों को दी काव्यांजलि


यह बातें गुरुवार को, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती-सह-सम्मान समारोह एवं कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए,सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि विशुद्धा जी ने अपना संपूर्ण जीवन साहित्य और संस्कृति-कर्म को दिया। वे एक पूर्णकालिक कलमजीवी साहित्य-सेवी थे। उनका संबंध सिनेमा और आकाशवाणी से भी रहा। उन्होंने फ़िल्मों और धारावाहिकों के लिए भी पटकथा और गीत लिखे। पाटलिपुत्र की महान विरासत पर दूरदर्शन के लिए लिखी गई उनकी धारावाहिक 'पाटलिपुत्र में बदलती हवाएँ, सिहरती धूप', नाट्य-साहित्य और बिहार को एक बड़ी देन है।
डा सुलभ ने कहा कि डा चतुर्भुज का जीवन बहु-आयामी था। वे रेलवे के अधिकारी रहे, अनेक विद्यालयों में शिक्षक रहे, आकाशवाणी की सेवा की, केंद्र-निदेशक के पद से अवकाश लिया, निजी कंपनियों में भी कार्य किए। अनेक कार्य पकड़े, अनेक छोड़े। किंतु एक कार्य से कभी पृथक नही हुए, वह था नाट्य-कर्म। सभी तरह की भूमिकाएँ की, नारी-पात्र की भी, नाटक लिखे, निर्देशन किया, प्रस्तुतियाँ की। नाट्य-कर्म से संबद्ध सबकुछ किया। उनका जीवन और नाटक पर्यायवाची शब्द की तरह अभिन्न थे। बालपन से मृत्य-पर्यन्त वे इससे कभी पृथक नहीं हो सके।
डा चतुर्भुज के पुत्र एवं सुप्रसिद्ध नाटककार डा अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि डा चतुर्भुज मेरे पिता ही नहीं मेरे आचार्य भी थे। जो कुछ भी सीखा, उन्हीं से सीखा। उन्होंने ही मुझे गढ़ा और संस्कृति-कर्मी और नाटककार बनाया। नाटकों में उनका प्राण बसता था। वे रेल में बैठकर नाटक लिखा करते थे। बौद्ध-साहित्य के विद्वान जगदीश कश्यप की प्रेरणा से उन्होंने स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की और पी एच डी भी ।वे रात के दस बजे के बाद, नीचे चटाई पर बैठकर, पढ़ा लिखा करते थे।
इस अवसर पर मुज़फ़्फ़रपुर के वरिष्ठ कवि डा विजय शंकर मिश्र को 'कवि विशुद्धानंद स्मृति सम्मान' से अलंकृत किया गया। विशुद्धानंद जी द्वारा स्थापित सांस्कृतिक संस्था 'आनन्दाश्रम' के सौजन्य से डा मिश्र को पाँच हज़ार एक सौ रूपए की सम्मान-राशि के साथ, वंदन-वस्त्र और स्मृति-चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
सम्मेलन की उपाध्यक्ष, डा मधु वर्मा, साहित्य मंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी, डा संजय पंकज, डा किशोर सिन्हा, डा ओम् प्रकाश जमुआर, डा चतुर्भुज के पुत्र कुमार शांत रक्षित, कवि विशुद्धानंद के कवि-पुत्र प्रवीर पाण्डेय, डा रमेश पाठक तथा विभारानी श्रीवास्तव ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि बच्चा ठाकुर, श्याम बिहारी प्रभाकर, मधुरेश नारायण, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, अविनाश बंधु, सिद्धेश्वर, नीता सहाय, इन्दु भूषण सहाय आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं से दोनों साहित्यिक विभूतियों को काव्यांजलि अर्पित की । मंच का संचालन कुमार अनुपम ने तथा धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालय मंत्री अशोक कुमार ने किया।
समारोह में, डा चंद्रशेखर आज़ाद, नीलेश्वर मिश्र, प्रणय कुमार सिन्हा, प्रशस्ति प्रियदर्शी, प्रेम अग्रवाल, प्रेक्षा प्रियदर्शी, निर्मला सिन्हा, नीरज मदं, नंद किशोर ठाकुर, पवन सिंह, रजनीकांत दूबे, एजाज़ अहमद आदि बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे।
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