"शब्द से पहले"
पंकज शर्माक्यों उठाऊँ लेखनी?
अभी तो पाँवों में लगी है
पथ की धूल भी अनजानी;
अभी तो मैंने
क्षितिज को दूर से ही देखा है।
क्या लिखूँ?
उस नदी की कथा
जिसे केवल तट पर खड़े होकर
निहारा है मैंने—
जिसकी धार में उतरा नहीं?
शब्द आते हैं,
पर मैं उन्हें लौटा देता हूँ।
वे पूछते हैं—
"क्या तुम्हारी चुप्पी ने
दुःख का स्वाद चखा है?"
क्योंकि जानता हूँ,
पीड़ा के विषय में लिखना सरल है;
पीड़ा को जीना नहीं।
और जो नहीं जिया गया,
वह सत्य भी नहीं बनता।
सुख भी तो उतना ही दुर्लभ है।
क्षण भर की धूप को
अनंत प्रकाश समझ लेना
उतनी ही बड़ी भूल है
जितनी अँधेरे को अंतिम मान लेना।
मैं अपने भीतर लौटता हूँ।
वहाँ कोई उत्तर नहीं,
केवल पदचिह्न हैं—
कुछ मिटे हुए,
कुछ अब भी नम।
शायद कविता वहीं जन्म लेती है,
जहाँ अनुभव
अपना नाम खो देता है;
और मनुष्य
अपने बारे में निश्चित नहीं रहता।
तब शब्द नहीं लिखे जाते—
वे स्वयं उतरते हैं,
जैसे रात के बाद
पूर्व दिशा में फैलता प्रकाश।
पहले जीवन बोलता है,
फिर कविता।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️
(शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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