कीकट से पालि, प्रकृति और ऋषियों का संगम
सत्येन्द्र कुमार पाठक
विश्व के इतिहास में कुछ ऐसे भू-भाग होते हैं जो केवल भूगोल की सीमाओं में नहीं सिमटते, बल्कि वे एक जीवंत विचार, एक निरंतर बहती चेतना और सभ्यताओं के उत्थान-पतन के जीवंत गवाह बन जाते हैं। भारत के दक्षिण-मध्य बिहार में स्थित 'मगध' ऐसा ही एक अलौकिक और युगांतरकारी क्षेत्र है। ऋग्वेद के 'कीकट' से शुरू होकर आधुनिक 'मगही' भाषी क्षेत्रों तक फैली यह भूमि न केवल साम्राज्यों के उदय (मौर्य, गुप्त, शिशुनाग, नंद वंश) की साक्षी रही है, बल्कि इसने ज्ञान, अध्यात्म, दर्शन, भाषा और लोक-संस्कृति की ऐसी समृद्ध विरासत को जन्म दिया है, जिसने संपूर्ण विश्व को आलोकित किया।
मगध के नामकरण, उसकी भौगोलिक सीमाओं, जीवनदायिनी नदियों, अभेद्य पर्वतों, पौराणिक राजाओं, पूज्य ऋषियों और यहाँ की अनूठी मिश्रित (समन्वित) संस्कृति का एक विस्तृत और प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
नामकरण, भाषा और क्षेत्र: पहचान का क्रमिक विकास - मगध की पहचान का इतिहास भाषाई और सांस्कृतिक संक्रमण का एक अनूठा उदाहरण है। इसके विकास को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है। ऋग्वेद में इस क्षेत्र को सबसे पहले 'कीकट' नाम से पुकारा गया। वैदिक काल के प्रारंभिक दौर में इसे देवताओं से विमुख, यज्ञ-विरोधी और अनार्य (व्रात्य) लोगों की भूमि माना जाता था। अथर्ववेद तक आते-आते यह क्षेत्र 'मगध' कहलाया। 'मगध' का शाब्दिक अर्थ 'मग' या 'मागध' लोगों की भूमि से है। ब्राह्मण ग्रंथों में इस क्षेत्र को मुख्यधारा की वैदिक संस्कृति से बाहर माना गया, क्योंकि यहाँ के लोग रूढ़िवादी कर्मकांडों के बजाय स्वतंत्र चिंतन और प्रकृति-पूजा में विश्वास रखते थे। यही 'अस्वीकार' आगे चलकर बौद्ध और जैन जैसे महान श्रमण धर्मों के उदय का कारण बना। मागध , मगी , मग , मगही और मगधी - मागध: प्राचीन काल में मगध के मूल निवासियों को मागध कहा जाता था। महाकाव्यों में 'मागध' एक विशेष वर्ग भी था जो राजाओं की कीर्ति और शौर्य का गान (स्तुति) करता था। मग (शाकद्वीपीय ब्राह्मण): मगध की संस्कृति में 'मग' लोगों का प्रवेश एक युगांतरकारी घटना थी। ये मूलतः ईरान या मध्य एशिया (शाक द्वीप) से आए सूर्य-उपासक और खगोलविज्ञानी थे। इन्होंने मगध के स्थानीय निवासियों के साथ ऐसा समन्वय स्थापित किया कि वे यहीं के होकर रह गए और मगध में 'सौर संस्कृति' की नींव रखी।
मागधी प्राकृत, मगी और मगही: मगध की प्राचीन लोकभाषा 'मागधी प्राकृत' थी। यह राजदरबारों की संस्कृत के समानांतर आम जनता की आवाज़ थी। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने संस्कृत के बजाय इसी लोकभाषा (और इसके रूपांतरित रूप पालि) को अपने उपदेशों का माध्यम बनाया, जिससे यह जन-जन की भाषा बन गई। यही मागधी प्राकृत मध्यकाल में अपभ्रंश होते हुए आज आधुनिक 'मगही' या 'मगी' के रूप में जीवित है। मगही केवल एक बोली नहीं है, बल्कि इसके भीतर मगध का लोक-साहित्य, मुहावरे, सोहर, कजरी और हज़ारों वर्षों का लोक-इतिहास सुरक्षित है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मगध का विस्तार आधुनिक बिहार के कई प्रमुख जिलों में है। इसका हृदय स्थल मुख्य रूप से पटना, गया, नालंदा, नवादा, जहानाबाद, अरवल, औरंगाबाद और शेखपुरा जिलों में फैला हुआ है। उत्तर में गंगा नदी, पश्चिम में सोन नदी, पूर्व में चंपा और दक्षिण में छोटानागपुर के पठार (विंध्याचल की शाखाएं) इसकी प्राकृतिक सीमाएं तय करते रहा है। मगध को प्रकृति ने जो भूगोल दिया, उसी ने इसका इतिहास लिखा। यहाँ की नदियाँ जीवन और मोक्ष की धाराएं हैं, तो यहाँ के पर्वत सुरक्षा के अभेद्य दुर्ग।।गंगा: मगध की उत्तरी सीमा बनाने वाली गंगा व्यापार, कृषि और परिवहन का मुख्य मार्ग थी। इसी के तट पर पाटलिपुत्र (पटना) जैसा महानगर फला-फूला। सोन (शोण): इसे 'हिरण्यवाह' भी कहा जाता है क्योंकि इसके आंचल में स्वर्ण-कण (सोने के कण) पाए जाते थे। सोन नदी ने मगध को पश्चिमी आक्रमणकारियों से एक प्राकृतिक ढाल प्रदान की। निलांजन (निरंजना) और मोहाने: छोटानागपुर के पठार से निकलने वाली ये दो नदियां जब बोधगया के समीप आपस में मिलती हैं, तो एक महातीर्थ का निर्माण होता है। इसी निलांजन नदी के तट पर सिद्धार्थ ने तपस्या की थी और वे बुद्ध कहलाए। फल्गु: निलांजन और मोहाने के संगम के बाद की संयुक्त धारा 'फल्गु' कहलाती है। पुराणों में इसे 'अंतःसलिला' कहा गया है। माता सीता के श्राप के कारण यह नदी ऊपर से सूखी प्रतीत होती है, लेकिन इसके रेत के नीचे जल की अविरल धारा बहती है। यह पूरी दुनिया में पितृ-तर्पण और पिंडदान की सबसे पवित्र नदी है।पुनपुन और मोरहर: सनातन परंपरा में पुनपुन को 'कीकट' की सबसे पवित्र नदी माना गया है। गया में श्राद्ध कर्म करने से पहले पुनपुन में स्नान और मुंडन कराना अनिवार्य माना जाता है। मोरहर फल्गु की ही एक पश्चिमी सहायक शाखा है जो मगध के मैदानी इलाकों को उपजाऊ बनाती है।
राजगीर पर्वतसमूह: राजगृह (राजगीर) पांच पहाड़ियों—वैभार, विपुल, रत्न, गिरि और उदयगिरि—से घिरा हुआ है। इन पहाड़ों ने मगध की पहली राजधानी को एक ऐसा प्राकृतिक किला दिया जिसे भेदना असंभव था। महाभारत काल में जरासंध का अखाड़ा इन्हीं पहाड़ियों के बीच था। बाद में, ये पहाड़ बौद्धों (गिद्धकूट पर्वत, जहाँ बुद्ध ने उपदेश दिए) और जैनियों (वैभवगिरि, जहाँ जैन मंदिर हैं) के पवित्र सिद्धक्षेत्र बने। बराबर पर्वतसमूह: जहानाबाद और गया की सीमा पर स्थित इन पहाड़ियों को प्राचीन काल में 'गोरथगिरि' कहा जाता था। महाभारत में उल्लेख है कि भगवान कृष्ण, भीम और अर्जुन ने मगध पर आक्रमण करने से पहले इसी पहाड़ी से जरासंध की राजधानी का निरीक्षण किया था। मौर्य सम्राट अशोक और उनके पौत्र दशरथ ने इन ठोस ग्रेनाइट पहाड़ियों को कटवाकर 'आजीविका संप्रदाय' के संतों के लिए लोमस ऋषि गुफा और सुदामा गुफा जैसी विश्वप्रसिद्ध वास्तुकलाओं का निर्माण कराया। ब्रह्मयोनि पर्वत: गया शहर के दक्षिण में स्थित यह ऐतिहासिक पहाड़ बौद्ध और सनातन दोनों परंपराओं का केंद्र है। यहाँ भगवान बुद्ध ने अपने एक हज़ार भिक्षुओं को 'आदित्य परियाय सुत्त' (अग्नि उपदेश) दिया था।
मगध का इतिहास मानव सभ्यता के विकास का क्रमिक इतिहास है, जिसमें चंद्रवंशी राजाओं से लेकर बौद्ध भिक्षुओं तक का योगदान है। चंद्रवंश और वृहद्रथ साम्राज्य की नींव में इला, बुध और एल: पुराणों, स्मृति ग्रंथों के अनुसार, वैवस्वत मनु की पुत्री इला और चंद्रमा के पुत्र बुध के संसर्ग से राजा एल (पुरूरवा) का जन्म हुआ। यहीं से चंद्रवंश की स्थापना हुई, जिसने मगध के राजनीतिक इतिहास की पृष्ठभूमि तैयार की।
राजा वसु और वृहद्रथ: राजा उपरिचर वसु के पुत्र वृहद्रथ ने मगध में पहले स्वतंत्र राजवंश की स्थापना की, जिसे 'वृहद्रथ वंश' कहा जाता है। राजा वसु ने ही राजगीर की पहाड़ियों के बीच 'गिरिव्रज' नगर की स्थापना की थी।
जरासंध: वृहद्रथ का पुत्र जरासंध मगध का सबसे प्रतापी और पराक्रमी सम्राट था। उसने उत्तर भारत के कई राजाओं को परास्त किया। श्रीकृष्ण की कूटनीति के कारण भीम के हाथों मल्ल युद्ध में उसका अंत हुआ। जरासंध शौर्य और सामरिक शक्ति का प्रतीक है। बाणासुर: पौराणिक आख्यानों में बाणासुर (शोनितपुर का राजा) को जरासंध का परम मित्र और सहयोगी माना गया है, जिसका प्रभाव सोन नदी के तटीय क्षेत्रों पर था। राजा गय: पुराणों में एक चक्रवर्ती राजा गय का उल्लेख है, जिन्होंने गया क्षेत्र में अभूतपूर्व यज्ञ किए थे। उनके दान और धर्मपरायणता के कारण इस क्षेत्र की ख्याति दूर-दूर तक फैली।
ऋषि संस्कृति की तपोभूमि मगध केवल राजाओं का नहीं, बल्कि ऋषियों का भी तपोवन था:। च्यवन ऋषि और औरव: भृगुवंशी महर्षि च्यवन की तपोभूमि आधुनिक औरंगाबाद जिले में स्थित 'देवकुण्ड' है। यहीं उन्होंने अपनी वृद्धावस्था को पुन: यौवन में बदलने के लिए दिव्य औषधियों (च्यवनप्राश) की खोज की थी। भृगुवंश के ही ऋषि औरव का संबंध औरंगाबाद का आद्री नदी तट क्षेत्र की आध्यात्मिक चेतना से है। श्रृंगी ऋषि , ध्रुव ऋषि का क्षेत्र नवादा है ।
ऋषि मधुश्रवा और जाह्नू: अरवल जिले का 'मधुश्रवा' नामक स्थान महर्षि च्यवन के भ्राता या उनसे जुड़े ऋषियों की जन्मस्थली माना जाता है। वहीं जहानाबाद जिले का ऋषि जाह्नू ने अपनी तपस्या के बल पर गंगा के प्रचंड वेग को सोख लिया था और बाद में अपनी जंघा से मुक्त किया, जिससे गंगा का नाम 'जाह्नवी' पड़ा। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में मगध वैश्विक दर्शन का केंद्र बना। भगवान बुद्ध: गया का उरुवेला वन बुद्ध की ज्ञानस्थली (बोधगया) बना। मगध के राजा बिंबिसार और अजातशत्रु उनके परम शिष्य बने। मगध की मिट्टी से ही बौद्ध धर्म पूरी दुनिया में फैला। भगवान महावीर: जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अपने जीवन का लंबा समय मगध में बिताया। नालंदा का पावापुरी उनकी निर्वाण भूमि बना, जहाँ आज भी जल मंदिर उनकी स्मृति को संजोए हुए है।
सांस्कृतिक समन्वय: देव, मनु, पितृ और धार्मिक पंथ में मगध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसने किसी एक विचारधारा को थोपा नहीं, बल्कि समय के साथ सभी धार्मिक धाराओं को आत्मसात कर लिया।।पितृ संस्कृति और मनु परंपरा - वैदिक काल से ही गया को 'पितृ तीर्थ' का सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वायु पुराण के अनुसार, जब असुर गयासुर के विशाल शरीर पर ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया, तो नारायण ने वरदान दिया कि जो भी इस भूमि पर आकर अपने पितरों का तर्पण (पिंडदान) करेगा, उसके पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त होगा। यह परंपरा मनु के काल से लेकर आज तक अनवरत चली आ रही है, जो इस बात का प्रतीक है कि मगध मृत पूर्वजों के प्रति भी कृतज्ञता का भाव रखता है।
सौर और अग्नि संस्कृति - मगध में सूर्य (आदित्य) की उपासना अत्यंत प्राचीन है। ईरान से आए 'मग' ब्राह्मणों ने यहाँ सूर्य पूजा को शास्त्रीय रूप दिया। औरंगाबाद जिले का का उमंगा , और 'देव सूर्य मंदिर', नालंदा जिले का का बडगांव पटना जिले का पंडारक , उलार , जहानाबाद जिले का सूर्यांक गिरी और गया का सूर्य मंदिर इसके साक्षात प्रमाण हैं। देव का सूर्य मंदिर भारत का इकलौता ऐसा मंदिर है जिसका मुख पूर्व के बजाय पश्चिम की ओर है। इसी सौर और अग्नि संस्कृति का जीवंत, आधुनिक और लोक-रूप 'महापर्व छठ' है, जहाँ बिना किसी पुरोहित या मंत्र के, सीधे प्रकृति (डूबते और उगते सूर्य) को अर्घ्य दिया जाता है।
ब्रह्म संस्कृति: गया के ब्रह्मयोनि पहाड़ और ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों की कथाएं यहाँ ब्रह्म उपासना की प्राचीनता को दर्शाती हैं। शैव और शाक्त: राजगीर के गर्म जल के कुंडों (सप्तधारा) को शिव और शक्ति की कृपा माना जाता है। गया की मंगलागौरी पीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है, जो तंत्र और शाक्त साधना का प्रमुख केंद्र रही है। बराबर की पहाड़ियों में स्थित सिद्धेश्वरनाथ मंदिर प्राचीन शैव परंपरा का गवाह है। वैष्णव संस्कृति: गुप्त साम्राज्य के दौरान मगध वैष्णव धर्म का वैश्विक केंद्र बना। गया का विष्णुपद मंदिर, जहाँ काले ग्रेनाइट पत्थर पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न (पदचिह्न) अंकित हैं, पूरी दुनिया के वैष्णवों के लिए परम श्रद्धेय स्थल है। इसका जीर्णोद्धार इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर नि की ।
वैदिक साहित्य में मगध को अक्सर असुरों, दानव , दैत्यों और राक्षसों की भूमि कहकर निंदित किया गया। लेकिन मगध की महानता इस बात में है कि उसने इस संघर्ष को 'समन्वय' में बदल दिया। गयासुर और जरासंध का पुनर्मूल्यांकन: सनातन संस्कृति में असुरों को खलनायक माना जाता है, लेकिन मगध ने गयासुरअसुर को 'महापवित्र' का दर्जा दिया। गयासुर ने अपनी देह मानवता के कल्याण और पितरों की मुक्ति के लिए दान कर दी। इसी तरह जरासंध को भले ही महाभारत में क्रूर दिखाया गया हो, लेकिन मगध के लोक-मानस में वह एक प्रतापी, अपनी प्रजा का रक्षक और न्यायप्रिय राजा था। नवादा और राजगीर के लोकगीतों में आज भी जरासंध का नाम आदर से लिया जाता है। मगध ने 'ऋषि संस्कृति' (ज्ञान, यज्ञ, उपनिषद) और 'अनार्य/असुर संस्कृति' (प्रकृति पूजा, तंत्र, लोककला) के बीच की खाई को पाट दिया। यहाँ आकर आर्य और अनार्य संस्कृतियां आपस में इस तरह विलीन हो गईं कि एक नई समन्वित भारतीय संस्कृति का जन्म हुआ।
प्रकृति और लोक-संस्कृत में मगध की चेतना केवल इंसानों तक सीमित नहीं रही, उसने प्रकृति के हर घटक को देवत्व प्रदान किया। वृक्ष और जल संस्कृति: बोधगया का बोधिवृक्ष (पीपल) ज्ञान का वैश्विक प्रतीक है। गया का अक्षयवट अमरता का प्रतीक है, जिसके बारे में मान्यता है कि सृष्टि के अंत में भी यह वृक्ष नष्ट नहीं होता। नदियों के घाटों, तालाबों (जैसे सूर्य कुंड) को पवित्र मानकर उनकी रक्षा करना मगध की जल संस्कृति का हिस्सा है। नाग संस्कृति: राजगीर का 'मणियार मठ' प्राचीन नाग पूजा का सबसे बड़ा केंद्र है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, मगध के लोग नागों को धन, वर्षा और भूमि का रक्षक मानते थे। मौर्य काल से पहले भी यहाँ नाग वंश के शासकों का प्रभाव था।
गंधर्व, अप्सरा और खग (पक्षी) संस्कृति: मगध की वादियों (विशेषकर राजगीर और ककोलत) की प्राकृतिक सुंदरता को देखकर पौराणिक काल में इन्हें गंधर्वों और अप्सराओं की क्रीड़ास्थली कहा गया। यहाँ के लोक संगीत में जो मिठास है, उसे गंधर्व कला का अंश माना जाता है। सोन, गंगा के दियारा क्षेत्रों और नवादा के ककोलत जलप्रपात के आसपास के वनों में पक्षियों (खग) के प्रति गहरा प्रेम है। पशु-पक्षियों के प्रति इसी सम्मान के कारण सोनपुर (मगध की सीमा पर) में विश्व का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है, जो पौराणिक 'गज और ग्राह' (हाथी और मगरमच्छ) की कथा से जुड़ा है। मगध का वैश्विक अवदान में "कीकट की धूल से लेकर पालि के वचनों तक, जहाँ जरासंध का शौर्य और बुद्ध का सत्य महकता है,।वह भूमि कोई और नहीं, हमारी ज्ञानस्थली मगध है।"ऋग्वेद के जिस 'कीकट' को कभी हेय दृष्टि से देखा गया था, उसी मगध ने आगे चलकर पूरे अखंड भारत को राजनीतिक एकता (चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य के नेतृत्व में) और वैश्विक अध्यात्म (अशोक के धम्म और बुद्ध के माध्यम से) प्रदान किया। मगध का असली अवदान उसकी 'समावेशी सोच' है। यहाँ इला और बुध के मिथक हैं; वृहद्रथ और जरासंध का शौर्य है; च्यवन और जाह्नू जैसे ऋषियों का तप है; तो बुद्ध और महावीर का अहिंसा संदेश भी है। फल्गु, निरंजना और सोन जैसी नदियां इसी समन्वय के गीत गाती हैं, तो राजगीर और बराबर के पर्वत इस महान इतिहास के अडिग प्रहरी बनकर खड़े हैं। आज की मगही भाषा और संस्कृति इसी विराट अतीत की जीवंत उत्तराधिकारी है, जो विविधता में एकता के भारतीय आदर्श को हज़ारों सालों से अपने सीने में संजोए हुए है।
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