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अंजाम गुलिस्तां क्या होगा

अंजाम गुलिस्तां क्या होगा

डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी
इस समय शिक्षा सस्ती बिक रही है । वैसे तो समय के परिप्रेक्ष्य में दिनो दिन इसका भाव गिरता ही जा रहा है ।कुछ दिन पूर्व बिहार के सभी प्राथमिक विद्यालय अपग्रेड कर दिए गए ।कुछ तो आज इंटर कॉलेज की उपाधी पा गए हैं । सरकार चाहती है कि गाँव के किसी भी बच्चे को पढ़ाई के लिए गाँव से बाहर नहीं जाना पड़े ।लेकिन बच्चे तो बच्चे ठहरे ।वे बाहर जाते ही हैं -कुछ पैसे के वल ,कुछ पैरवी के वल ।भले वहाँ जाकर वे आत्महत्या ही क्यों न कर लें ।सरकार भी क्या करे ,उसे जनता के बीच अपना काम गिनाना होता है ।इसलिए अपनी प्रगती रिपोर्ट को तंदरुस्त करने के लिए धरती पर न तो न सही ,कागज पर तो करना ही पड़ता है ।
एक कवि जी गुमगुना रहे थे -
एतना स्कूल और कॉलेज खुल गेल,
कि पहिलका पढ़ाई सब चुल्हा में गेल ।
यहाँ पहिलका पढ़ाई विचारणीय है ।हाई स्कूल पंचायत स्तर पर भी नहीं हुआ करता था ।हमें याद है कि तपती गरमी में स्कूल से तीन मील पैदल चल कर घर आना पड़ता था ।इसके बाबजूद क्या मजाल कि एक क्लास भी छूट जाए । शिक्षक माता ,पिता एवं मित्र की भूमिका में होते थे । वे बड़े विद्वान होते थे । कोई कोई तो ऐसे शिक्षक होते थे ,जिनके नाम पर स्कूल चलता था । वे स्कूल से आगे होते थे । उनके वात्सल्य भाव से छात्रों का सर्वांगीण विकास होता था ।थ्योरी के च्लास से प्रायोगिक क्लास ज्यादा महत्वपूर्ण माने जाते थे ।केमिस्ट्री में जिसे साल्ट टेस्ट आ गया ,उसकी मुश्किलें थोड़ी बढ़ जाती थीं ।बेसिक रेदिकल खोजने में कठिन प्राणायाम करना पड़ता था ।जीव विज्ञान में फैमिली आदि का पता तो चल जाता था परंतु जन्तु विज्ञान में मोलस्का या एनिलिडा का दिसेक्सन कठिन होता था ।इसी तरह फिजिक्स मैं लाइट का प्रैक्टिकल स्लैव आदि के कारण कठिन हो जाता था ।
बी एड में प्रैक्टिसिंग लेसन होता तो मजेदार था ,परंतु यह गाड़ी कई गेयरों से निकालनी होती थी ।इसके लिए कभी कोई टेंढ़ विद्यालय मिल गया तो समझिए कल्याण हो गया ।लेकन हाँ ! यहाँ शिक्षक बनते थे ।ग्रैजुएशन करने के बाद दिमाग अपने आप खुल जाता था ।यह थी पहिलका पढ़ाई ।
अब तो चुल्हो नहीं है ।पता नहीं वे सब कहाँ गूम हो गए ।
अब आज की पढ़ाई के वारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है ।बस इससे तुलना कर लिजीए ।अब कॉलेज में पढ़ने के लिए दूर नहीं जाना होगा ।हर ब्लॉक में कॉलेज हो गया ।कुछ दिन पूर्व सभी हाई स्कूलों को अपग्रेड कर इंटर कॉलेज बना दिया गया ।शिक्षकों की नियुक्ति हो गई ।थोड़ा बिल्डिंग भी बन गया ।उपयोगी अन-उपयोगी साधित्र भी खरीदे गए । इंटर कॉलेज हो गया ।
सरकार अपने हृदय पर हाथ रखकर देखे कि क्या,ये संस्थान आवश्यकता की पूर्ति में सक्षम हैं ? छात्रों की शिक्षा में वे सक्षम हैं ?
इसके लिए -क्या ,शिक्षकों को स्वतंत्र होकर अपना काम करने दिया जा रहा है ?
विद्यालय के प्रधानाध्यापक न तो शिक्षकों के विरमन के लिए स्वतंत्र हैं ,न योगदान के लिए । वे छात्रों की परीक्षा में भी अपनी भूमिका नहीं निभा सकते । वे अपने अधीनस्थ शिक्षकों के अवकाश स्वीकृत करने में या वेतन भुगतान में भी स्वतंत्र नहीं हैं ।वे अपने स्कूल के लिए न तो आवश्यकता के अनुरूप खरीदारी कर सकते हैं न पाठ्यक्रम का निर्माण। प्रश्न पत्र तो बड़ी दूर की बात हो गई ।
जिस तरह स्कूलों को बिना आधारभूत संरचना के ,जिसमें पाठ्यसाधन ,योज्ञ शिक्षक ,प्रयोगशालाएँ ,उपस्कर सम्मिलित हैं ,अपग्रेड करके शिक्षा का जनाजा निकाला गया ,उसी प्रकार हरेक ब्लॉक में डिग्री कॉलेज खोलने के जल्दीबाजी में लिया गया निर्णय हास्यास्पड सिद्ध होगा ।
सरकार अगर शिक्षा में सुधार चाहती है तो सिलेवस पर ध्यान देना होगा ।पढ़ाई का स्तर ठीक करना होगा ।शिक्षकों में उनके गौरव का ध्यान रखना होगा ,उनकी सुख सुविधाओं क ख्याल रखना होगा और उनकी जिम्मेवारी उन्हें सौंपनी होगी ।हाँ ! निगरानी सरकार को अपने हाथ में रखनी होगी ।
असली शिक्षाविदों से परामर्श लेना भी नहीं भूलना होगा । शिक्षाविद् की परिभाषा अभी बदल गई है ।जो कभी स्कूल नहीं गया ,जिसने कोई लेख भी नहीं लिखा ,जिसने कोई छात्र नहीं तैयार किया ,आज वही शिक्षाविद् हो रहे हैं ।
और अंत में एक निवेदन कि शिक्षा राष्ट्र का मेरुदंड होती है ,इसे मजाक मत समझिए। वैसे तो भारत ही गुरु रहा है ,परंतु हम अपने को पहचान नहीं रहे हैं ।इसलिए तत्काल दूसरे देशों का अनुकरण करना चाहिए ।
राष्ट्रीय शिक्षा पुरष्कार,साहित्य सम्मान प्राप्त पूर्व प्राचार्य
राष्ट्रीय अध्यक्ष,अखिल भारतीय मगही प्रचारनी सभा ,
आनन्द विहार कुंज,माड़नपुर ,गयाजी।
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