Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

मकर संक्रांति

मकर संक्रांति

कईसे मनाईं मकर संक्रांति ,
दिमाग भरल अनेक भ्रांति ।
पावन मन के पावन त्यौहार ,
दुनिया में बढत बा क्रांति ।।
का बताईं दुनिया के हालत ,
दुनिया के मन कहाॅं बा शुद्ध ।
केहू से केहू कम ना इहवाॅं ,
बुझाता लाग जई विश्व युद्ध ।।
कईसे मनाईं आपन खुशी ,
जब दुनिया में बाटे अशांति ।
जहाॅं तहाॅं शुरू भईल युद्ध ,
सबके मुॅंह के गईल कांति ।।
कोई केहू से कम ना भ‌ईल ,
केहू के मन में न‌ईखे क्षांति ।
न‌ईखे केहू अब दया पात्र ,
सबके मन में एके बा दांति ।।
एक के बदले दू तीन चार ,
न‌ईखे केहू के केहूए यार ।
अहंकारी जब आगे बढ़ी त ,
पीछे से रहबे करी त‌ईयार ।।
मन से मन मिल जाई तब ,
निमन सब व्यवहार होई ।
जन जन मन हर्षित रही त ,
निमन से हर त्यौहार होई ।।
शब्दार्थ : दांति = अवरोध , वध
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ