मकर संक्रांति
कईसे मनाईं मकर संक्रांति ,दिमाग भरल अनेक भ्रांति ।
पावन मन के पावन त्यौहार ,
दुनिया में बढत बा क्रांति ।।
का बताईं दुनिया के हालत ,
दुनिया के मन कहाॅं बा शुद्ध ।
केहू से केहू कम ना इहवाॅं ,
बुझाता लाग जई विश्व युद्ध ।।
कईसे मनाईं आपन खुशी ,
जब दुनिया में बाटे अशांति ।
जहाॅं तहाॅं शुरू भईल युद्ध ,
सबके मुॅंह के गईल कांति ।।
कोई केहू से कम ना भईल ,
केहू के मन में नईखे क्षांति ।
नईखे केहू अब दया पात्र ,
सबके मन में एके बा दांति ।।
एक के बदले दू तीन चार ,
नईखे केहू के केहूए यार ।
अहंकारी जब आगे बढ़ी त ,
पीछे से रहबे करी तईयार ।।
मन से मन मिल जाई तब ,
निमन सब व्यवहार होई ।
जन जन मन हर्षित रही त ,
निमन से हर त्यौहार होई ।।
शब्दार्थ : दांति = अवरोध , वध
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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