दुनियादारी
जय प्रकाश कुवंरजीवन है चलने का नाम।
बितता जाये सुबह और शाम।।
शरीर का है कौन ठिकाना।
इसको है एक दिन मिट जाना।।
जितना भी चमकाओ इसको।
तेल फुलेल लगाओ इसको।।
एक दिन झुर्रियाँ पड़ जाएंगी।
देह की चमक मर जाएगी।।
जीवन का लेखा जोखा करलो।
खुशी और गम मन में भरलो।।
नाहक तुमने उम्र गंवाया।
खुश न सबको करने पाया।।
अब सब लांछन सहना होगा।
मुंह बंद कर रहना होगा।।
कोई न तेरा गुण गाएगा।
माथे केवल दोष मढ़ा जाएगा।।
दफन हुई तेरी होशियारी।
सब दोषों में तेरी भागीदारी।।
ऐसे ही शेष दिन निकल जाएगा।
एक दिन सूरज ढल जाएगा।।
पगले,अक्ल गयी है तेरी मारी।
समझो यही है दुनियादारी।।
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