"भीतर का उजास"
पंकज शर्माकिस खोज में भटकते हो,
जब प्रश्न ही उत्तर की देह ओढ़े खड़ा है?
मैं कोई दुर्लभ संकेत नहीं,
न ही ग्रंथों में बंद कोई अंतिम सूत्र—
मैं तुम्हारी दृष्टि की थकान में
अनकहा ठहरा हुआ हूँ।
मैंने साधु का वेश इसलिए नहीं पहना
कि संसार से इनकार कर सकूँ,
बल्कि इसलिए
कि संसार को बिना शोर के सुन सकूँ।
मेरे झोले में
शून्य है—
और वही सबसे भारी है।
प्रेम कोई अर्जित वस्तु नहीं,
न तप से उपजता पुरस्कार।
वह तो उस क्षण फूट पड़ता है
जब तुम स्वयं से
एक पल के लिए हट जाते हो।
मैं उसी रिक्ति में
अनायास उपस्थित हूँ।
तुम मुझे खिले फूलों में खोजते हो,
रंग और सुवास के उत्सव में—
और मुरझाए फूलों से
दृष्टि फेर लेते हो।
पर मैं दोनों में समान हूँ:
होने और मिटने की
समान स्वीकृति।
शिव के चरणों में रखा पत्ता
और मरघट की आग—
दोनों मेरे ही विस्तार हैं।
एक में अर्पण की नमी है,
दूसरे में विरक्ति की ज्वाला।
मैं न पवित्र से बंधा हूँ,
न अपवित्र से भयभीत।
तुम दूर-दूर जाना चाहते हो,
ऊँचे शिखरों, गूढ़ प्रतीकों तक—
पर देखो,
मैं तुम्हारी साँस के ठहराव में
तुम्हारे प्रश्न से पहले
उपस्थित हूँ।
जीवंत देखना सीखो—
मतलब यह नहीं कि
सब कुछ सुंदर दिखे,
बल्कि यह कि
जो जैसा है
उसे वैसा ही स्वीकार किया जाए।
मैं उसी स्वीकार में
निर्विवाद हूँ।
तो किस खोज की तलाश है, प्रिय?
जिसे तुम बाहर ढूँढ़ते हो
वह भीतर ही
निर्वस्त्र खड़ा है।
मैं साधारण हूँ,
इसलिए अनदेखा हूँ—
और शायद
इसीलिए सर्वत्र हूँ।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️
(शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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