खेल निराले
संजय जैनखेल ऐसा तुम खेलो
जिसमें मज़ा आ जाये।
जीवन के भी सारे राज
जिस में शमा जाये।
और एक आ-भूत सा
नया चेहरा समाने आ जाये।
और खेल खेलने का
सही मजा आ जाये।।
जो काम इंसानो को
खुद करना चाहिए।
वो काम आज कल
आँखे कर रही है।
जो सामने वाले को
लुभा और बुला रही है।
फिर आगे नई कहानी
यही से लिखी जा रही है।।
अब तो नये-नये खेलों का
अविष्कार हो रहा है।
जो गली मोहल्ले और
चौहराहो पर खेले जा रहे।
जिसका आंनद हर कोई
मौजमस्ती के लिए उठा रहे है।
और उन खेलो को अब
घरो तक पहुंचा रहे है।।
दिन रात दूरदर्शन भी
बहुत खेल दिखता है।
जिसका असर भी तो
घर-परिवार पर पड़ता है।
जो नये रिश्तें बनवता है
और शर्मसार करवाता है।
जिसे आधुनिक युग का
मसीहा कहा जाता है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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