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तीर्थराज प्रयाग : कल्पवास की कालजयी यात्रा

तीर्थराज प्रयाग : कल्पवास की कालजयी यात्रा

सत्येन्द्र कुमार पाठक
प्रयागराज की पावन धरती पर माघ मास में आयोजित होने वाला 'कल्पवास' केवल एक धार्मिक मेला नहीं है, बल्कि यह भारत की पाँच हजार वर्षों से अधिक पुरानी जीवंत सभ्यता का दस्तावेज़ है। इतिहास केवल राजाओं के युद्धों और समझौतों का नाम नहीं है, बल्कि उन परंपराओं का भी नाम है जो हज़ारों सालों से अटूट बनी हुई हैं। प्रयागराज का कल्पवास विश्व के सबसे पुराने निरंतर चलने वाले सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। कल्पवास का सबसे प्राचीन संदर्भ ऋग्वेद के परिशिष्ट भाग में मिलता है, जहाँ 'सितासित' (श्वेत और श्याम यानी गंगा-यमुना) के संगम का वर्णन है। पुराणों के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी ने यहाँ 'प्रकृष्ट यज्ञ' किया था, जिससे इसका नाम 'प्रयाग' पड़ा। मगध सम्राट अशोक और उनके बाद के शासकों के शिलालेखों में भी प्रयाग की महत्ता का संकेत मिलता है। प्रयाग का 'अक्षयवट' कल्पवास की प्राचीनता का मूक गवाह रहा है, जिसके नीचे बैठकर हज़ारों वर्षों से ऋषि-मुनि तपस्या करते आए हैं।त्रेतायुग और द्वापरयुग का साक्ष्य में कल्पवास को महाकाव्य काल से जोड़कर देखते हैं: । त्रेतायुग में : वनवास के दौरान भगवान श्रीराम का महर्षि भारद्वाज आश्रम (प्रयाग) में आगमन और वहाँ के आध्यात्मिक अनुशासन का वर्णन मिलता है। महर्षि भारद्वाज को उस समय के 'प्रयाग विश्वविद्यालय' का कुलपति माना जाता था, जहाँ हज़ारों विद्यार्थी और साधक कल्पवास जैसी साधना करते थे। द्वापरयुग में : महाभारत के 'अनुशासन पर्व' में भीष्म पितामह ने माघ मास में प्रयाग निवास को तपस्या का उच्चतम शिखर बताया है। यह सिद्ध करता है कि द्वापर युग में भी कल्पवास की सुव्यवस्थित परंपरा विद्यमान थी।
. विदेशी यात्रियों की आँखों से प्रयाग (7वीं सदी) में कल्पवास के सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत में मिलते हैं, जो सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल (644 ईस्वी) में प्रयाग आए थे। ह्वेनसांग ने लिखा है कि संगम के रेतीले मैदान पर लाखों लोग महीनों तक तपस्या करते थे। उन्होंने सम्राट हर्षवर्धन के 'महामोक्ष परिषद' का वर्णन किया है, जहाँ राजा अपना सब कुछ (राजकीय वस्त्रों तक) दान कर देते थे और कल्पवासियों की सेवा करते थे। यह दुनिया का सबसे बड़ा ऐतिहासिक दान उत्सव था मध्यकाल में भी कल्पवास की निरंतरता बनी रही। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा:है। "माघ मकर गति रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥" यह दर्शाता है कि 16वीं शताब्दी में भी देश के कोने-कोने से लोग यहाँ कल्पवास के लिए आते थे। अकबर के शासनकाल में जब 'इलाहाबाद' किले का निर्माण हुआ, तब भी कल्पवास की भौगोलिक सीमाएं और धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित रही। . ब्रिटिश काल के शासनकाल में माघ मेले और कल्पवास पर कर लगाने की कोशिश की गई, जिसका भारी विरोध हुआ। ब्रिटिश गजेटियर्स में प्रयाग के कल्पवास को "दुनिया का सबसे अनुशासित अस्थायी मानव जमावड़ा" कहा गया है। उस दौर में रेलमार्ग विकसित होने से कल्पवासियों की संख्या लाखों से करोड़ों में पहुँच गई।
कल्पवास का 'अध्यात्म-शास्वत ऐतिहासिक रूप से कल्पवास के तीन मुख्य स्तंभ रहे हैं:। कायाकल्प शरीर को उपवास और पवित्र जल से शुद्ध करना। मध्यकाल में यह ज्ञान के आदान-प्रदान का सबसे बड़ा केंद्र था। इतिहास गवाह है कि यहाँ अछूतोद्धार और सामाजिक एकता के बड़े आंदोलन हुए है। एक शाश्वत विरासत आज जब हम 2026 के प्रयागराज को देखते हैं, तो पाते हैं कि तकनीक बदल गई है—अब टेंटों में बिजली है, सड़कों पर कंक्रीट है, लेकिन कल्पवासी की आत्मा वही है। वह आज भी उसी श्रद्धा से गंगा की गोद में अपनी कुटिया बनाता है जैसे हज़ारों साल पहले उसके पूर्वज बनाते थे। कल्पवास भारतीय इतिहास की वह कड़ी है जो हमें यह याद दिलाती है कि हमारी संस्कृति 'भोग' की नहीं, बल्कि 'योग' और 'त्याग' की है। यह विश्व को भारत का संदेश है कि शांति हथियारों से नहीं, बल्कि आत्म-संयम से प्राप्त होती है।


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