'मौन की गरिमा और आत्मबोध"
पंकज शर्मास्पष्टीकरण वहीं सार्थक होता है, जहाँ उसे ग्रहण करने का विवेक एवं स्वीकारने की उदारता हो। बंद मन के सम्मुख दिया गया तर्क, शब्दों की थकान मात्र बन जाता है। जैसे कुम्हार सूखी मिट्टी को नहीं गढ़ता, वैसे ही जड़ चेतना संवाद से नहीं संवरती। जीवन में कई बार मौन, वाणी से अधिक प्रखर उपदेशक सिद्ध होता है—क्योंकि मौन आत्मविश्वास का वह दीप है, जो बिना बोले सत्य को प्रकाशित करता है।
यदि किसी ने आपको गलत समझ लिया है, तो हर बार सफाई देना आत्मसम्मान की अवहेलना है। आत्मा की दृष्टि में गिरना, समाज की स्वीकृति पाने से कहीं बड़ा पतन है। जो अपने सत्य में स्थिर है, उसे प्रमाणों की भीख नहीं चाहिए। समय स्वयं न्याय करता है; और सत्य, देर से ही सही, पराजित नहीं
. "सनातन" (एक सोच , प्रेरणा और संस्कार
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