भारत में बालिका शिक्षा और सशक्तिकरण
सत्येन्द्र कुमार पाठक
किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सही पैमाना उस देश की महिलाओं और बालिकाओं की स्थिति से मापा जाता है। भारत जैसे विविध और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में, बालिकाओं को 'शक्ति' का रूप माना गया है। हालांकि, समय के साथ सामाजिक कुरीतियों और पितृसत्तात्मक सोच ने उनके अधिकारों को सीमित कर दिया। आज के आधुनिक युग में, भारत दो महत्वपूर्ण दिवसों के माध्यम से बालिकाओं के अधिकारों और उनकी शिक्षा के संकल्प को दोहराता है: 3 जनवरी (सावित्रीबाई फुले जयंती) और 24 जनवरी (राष्ट्रीय बालिका दिवस)। ये दिन केवल उत्सव नहीं हैं, बल्कि समाज में बदलाव की एक पुकार हैं।
3 जनवरी: सावित्रीबाई फुले और महिला शिक्षा की क्रांति भारत में बालिका शिक्षा की बात सावित्रीबाई फुले के जिक्र के बिना अधूरी है। 3 जनवरी 1831 को जन्मी सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं। उन्होंने एक ऐसे समय में शिक्षा का मशाल जलाया जब महिलाओं का घर से निकलना भी वर्जित था।: सावित्रीबाई ने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए देश का पहला स्कूल खोला। जब वे पढ़ाने जाती थीं, तो लोग उन पर पत्थर और कीचड़ फेंकते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे अपने थैले में एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं ताकि गंदी साड़ी बदलकर स्कूल में बच्चों को पढ़ा सकें।
विरासत: आज भारत की हर शिक्षित महिला के पीछे सावित्रीबाई फुले का संघर्ष है। 3 जनवरी को उनके जन्मदिन को बालिका शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने के रूप में मनाया जाता है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2008 में शुरू किया गया 'राष्ट्रीय बालिका शिक्षा दिवस' देश की बेटियों को समर्पित एक विशेष दिन है। यह दिन औपचारिक रूप से उन चुनौतियों को स्वीकार करने का अवसर है जो एक लड़की जन्म से पहले और जन्म के बाद झेलती है।लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना: समाज में लड़के और लड़की के बीच के अंतर को खत्म करना।
बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या और यौन शोषण जैसे अपराधों के खिलाफ जागरूकता फैलाना। किशोरियों के स्वास्थ्य और उचित खान-पान पर ध्यान केंद्रित करना। भारत सरकार ने 'बेटी' को बोझ नहीं बल्कि गौरव बनाने के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की हैं:बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ: इस अभियान ने गिरते लिंगानुपात (Sex Ratio) को सुधारने और लड़कियों की शिक्षा सुनिश्चित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। सुकन्या समृद्धि योजना बालिकाओं के सुरक्षित भविष्य और उनकी उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय बचत को प्रोत्साहन देती है।कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय: ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों की लड़कियों के लिए मुफ्त आवासीय शिक्षा सुनिश्चित करना।मासिक धर्म स्वच्छता योजना (Menstrual Hygiene Scheme): ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना। एक लड़की को शिक्षित करने का अर्थ है एक पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ी को शिक्षित करना। शिक्षा न केवल उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान करती है, बल्कि उनमें निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है।
आत्मनिर्भरता: शिक्षित लड़कियां अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए स्वयं खड़ी हो सकती हैं।।आर्थिक विकास: जब महिलाएं कार्यबल में शामिल होती हैं, तो देश की जीडीपी में प्रत्यक्ष रूप से वृद्धि होती है।कुप्रथाओं का अंत: शिक्षा ही वह हथियार है जिससे बाल विवाह और दहेज जैसी कुरीतियों को जड़ से मिटाया जा सकता है।।आधुनिक भारत की बेटियां: हर क्षेत्र में अग्रणी।आज की भारतीय बालिकाएं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। खेल के मैदान से लेकर अंतरिक्ष की गहराइयों तक, वे अपनी सफलता का परचम लहरा रही हैं:विज्ञान और अंतरिक्ष: कल्पना चावला और टेसी थॉमस (मिसाइल वुमन) जैसी प्रेरणाएं।खेल: पीवी सिंधु, मैरी कॉम और मिताली राज ने साबित किया कि बेटियां देश का मान बढ़ाती हैं।
प्रशासन: हर साल यूपीएससी के नतीजों में लड़कियां शीर्ष स्थान प्राप्त कर रही हैं। समाज की भूमिका और हमारी जिम्मेदारी सरकार की नीतियां और महापुरुषों की प्रेरणा तब तक सफल नहीं होगी, जब तक समाज अपनी सोच नहीं बदलेगा।हमें लड़कियों को केवल 'बेटियों' के रूप में नहीं, बल्कि 'स्वतंत्र व्यक्तियों' के रूप में देखना होगा।लड़कियों के लिए एक सुरक्षित वातावरण बनाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाना और आस-पास की हर बच्ची को स्कूल भेजने का संकल्प लेना ही इन दिवसों की सच्ची सार्थकता है।राष्ट्रीय बालिका दिवस और सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें याद दिलाता है कि अंधेरा कितना भी घना क्यों न हो, शिक्षा का एक दीपक उसे मिटा सकता है। 24 जनवरी और 3 जनवरी केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं, बल्कि यह हमारे लिए आत्म-चिंतन का समय है। आइए संकल्प लें कि हम एक ऐसा समाज बनाएंगे जहां हर बेटी बिना किसी डर के सपने देख सके और उन्हें पूरा कर सके।
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