“जब कानून बनाने वाले ही अपराधी हों, तो न्याय की उम्मीद किससे करें?” — माया श्रीवास्तव

बंगलौर (सरजापुर)
बंगलौर के सरजापुर में समर्थ नारी–समर्थ भारत के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में संगठन की राष्ट्रीय सह-संयोजिका तथा बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल की प्रभारी श्रीमती माया श्रीवास्तव ने महिला सुरक्षा और न्याय को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अब केवल भाषणों से काम नहीं चलेगा, समय आ गया है कि कथनी और करनी में समानता दिखाई दे।
श्रीमती श्रीवास्तव ने कहा कि हाल ही में भाजपा शासित बिहार में एक मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच से एक नवोदित महिला डॉक्टर का हिजाब खींचे जाने जैसी घटना अत्यंत शर्मनाक है, किंतु इस पर न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से कोई स्पष्ट बयान आया और न ही कोई ठोस कार्रवाई दिखी। ऐसे में देश की महिलाएं अपनी सुरक्षा की उम्मीद किससे करें?
उन्होंने 2012 की दिल्ली निर्भया घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्ता संभालने के शुरुआती दिनों में प्रधानमंत्री ने पीड़िता के परिजनों को महिला सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आश्वासन दिया था, लेकिन आज हालात उन वादों से मेल नहीं खाते। उत्तर प्रदेश के हाथरस कांड, जहां एक दलित युवती के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद प्रशासनिक अमानवीयता सामने आई, ने देश को झकझोर दिया, पर न्याय की राह आज भी अधूरी है।
श्रीमती श्रीवास्तव ने 2023 में महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों और उनकी न्याय की मांग का जिक्र करते हुए कहा कि गंभीर आरोपों के बावजूद सत्ता की चुप्पी ने महिलाओं का भरोसा तोड़ा। मणिपुर की घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वहां महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने और सामूहिक बलात्कार के वीडियो सामने आए, जिसके बाद देश-विदेश में आक्रोश फैला। तब जाकर सरकार बयान देने को मजबूर हुई, पर आज भी सवाल यही है—क्या पीड़िताओं को न्याय मिला?
उन्होंने कहा कि जब-जब सरकारें निष्क्रिय रहीं, तब-तब सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। यह स्थिति लोकतंत्र और महिला अधिकारों दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। “बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ” जैसे नारों के बीच यदि आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों को टिकट देकर विधानसभा और लोकसभा भेजा जाए, तो यह राजनीतिक पाखंड नहीं तो और क्या है?
श्रीमती श्रीवास्तव ने कहा कि 2014 से 2025 तक बार-बार महिलाओं के साथ अत्याचार की घटनाएं सामने आना सत्ता की विफलता को उजागर करता है। यदि यही हाल रहा, तो आने वाले समय में महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षित चलना भी कठिन हो जाएगा। उन्होंने सवाल उठाया कि जिन विधायकों और सांसदों पर महिला उत्पीड़न के आरोप हैं, उन्हें संरक्षण कैसे दिया जा सकता है?
कार्यक्रम में उन्होंने महिलाओं से आह्वान किया कि वे चुप न रहें और उत्पीड़न के खिलाफ संगठित होकर आवाज उठाएं। “निष्क्रियता शब्दों से अधिक मुखर होती है,” कहते हुए उन्होंने केंद्र सरकार से जवाबदेही की मांग की।कार्यक्रम की अध्यक्षता सुमन पटवारी ने की। संचालन रुचिका जैन ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन स्वर्णलता ने दिया। इस अवसर पर आशा मजुमदार, बीना राठौड़, लतिका झुनझुनवाला, इंद्राणी प्रिया झुंझुवाला, सुजाता राठौड़, खुशबू नागर, रश्मि अग्रवाल, विंदु कारण, अमृता धारीवाल, रानी मोदी, गीता नगर, लीना सिन्हा, कविता जोशी, सरोज जायसवाल सहित बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित रहीं।
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