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"​नेति-नेति"

"​नेति-नेति"

पंकज शर्मा
सूचनाओं के भारी बस्ते में
कराहता है विवेक
जैसे सूखी झील के तल में
मछली का एक अंतिम छटपटाता सच।

हमने संजोए हैं आँकड़े
हजारों शब्द, परिभाषाएँ और संदर्भ
जैसे अंधेरे कक्ष में
जला लिए हों असंख्य जुगनू।

पर जुगनू सूर्य नहीं होते—
वे केवल अपना अस्तित्व चमकाते हैं
पथ को आलोकित करने वाली
दृष्टि उधार नहीं मिलती।

स्मृति एक गोदाम है
जहाँ पुराने अखबारों की रद्दी
अतीत की धूल चाटती है
और हम उसे 'बोध' कह कर पूजते हैं।

जान लेना—
केवल एक परिचय है परिधि का,
देख लेना—
केंद्र में उतरकर स्वयं को खो देना है।

आँखें जो केवल बाहर खुलती हैं
वे दर्पण नहीं हो सकतीं,
वे केवल संग्राहक हैं
बिम्बों के उस शोर की जो मौन को खा जाता है।

यह जो भ्रम की चादर है
पढ़ी हुई किताबों के अक्षरों से बुनी—
कितनी भारी है यह,
कि अनुभव का नग्न पाँव इसके नीचे दब गया है।

आओ, स्मृतियों के इस बोझ को उतारें
ताकि सूचनाओं की भीड़ में
कहीं वह 'अन्वेषण' जीवित रह सके
जो जानने से नहीं, होने से उपजता है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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