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तुमको चाहना

तुमको चाहना

भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र 'अणु'
तुमको चाहना
क्या गुनाह है
यदि हां
तो वो भी कहो ना
जब तुम्हें देखा
बस मुझे ऐसा लगा
कि तुमको मेरी जरूरत है
और मैं हमेशा खड़ा रहा
उस जरूरत के वक्त
देखकर संभावना
तुम भी मुझे देख खुश रही
ऐसी वैसी न कही
सबमें साथ दी
हुआ कुछ गलत या फिर सही
न दी उलाहना
बस मुझे ऐसा लगा
जैसे मैं बन सकता हूं तेरा सगा
और फिर धीरे-धीरे अनुराग जगा
न तुम दोगी दगा
और न करोगी बहाना
और तुम दी भरपूर सहयोग
कि न हो वियोग
उपस्थित करती रही हमेशा
बातचीत का संयोग
उधर आना इधर जाना
बीतता रहा समय
कर लिया मन ही मन निश्चय
नहीं चाहिए हय,गय
मिटा द्वंद्व हुआ निर्भय जय
पा नव सांत्वना
अब न जाने क्यूं
मुझे लगने लगा यूं
न रहा अब .... वो सब
ज्यूं का त्यूं
जैसा देखा था सपना
शायद तेरी महत्वाकांक्षा
या फिर मेरी विकट परीक्षा
जो आमाद हुआ तो हुआ
बस बढ़ती गई तितिक्षा
हुए बिना सामना
हर बात बताई
कभी कुछ न छिपाई
बात रिश्ते की हो या कमाई
आस-पड़ोस की या बाप भाई
हां हुआ या फिर अनमना
न जाने क्यूं ऐसा लग रहा मुझे
कि कहीं खो न दूं मैं तुझे
इसीलिए ये मन रहता है बुझे-बुझे
ढूंढता हूं जबाब अनसुलझे
जो मिटा दे कोहरा घना
अरे!ओ मेरी तकदीर
कह दे न एक बार फिर
उसकी जिंदगी तेरी तस्वीर
है तेरे लिए बना
बस ये अंतिम बार
तुमसे मैं पुछ रहा हूं यार
मिल जाओगी पुरा पुरा
या छोड़ दोगी इश्क सा अधूरा
मैं चाहता हूं सुनना
बस एक बार कहो ना
मैं जानता हूं कि
ये सरल नहीं है कहना
बहुत बंदिशें हैं इसमें
और मुश्किल भी है रहना जीना
फिर भी चाह रहा हूं सुनना
उन बातों को
जो तुम अब तक
मुझसे भी छुपाए रखी
होकर चौकन्ना
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