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"अनावरण की ओर"

"अनावरण की ओर"

पंकज शर्मा
मैंने पाया—
बनने की उतावली में
मैंने स्वयं पर ही
असंख्य परतें चढ़ा ली थीं।


नाम, भूमिका, अपेक्षाएँ—
ये सब जैसे उधार की पहचानें थीं,
जिन्हें ढोते-ढोते
मेरा स्वत्व मौन हो गया था।


भीतर कोई कहता रहा,
“तुम्हें और नहीं,
कम होना है—
कम आडम्बर, कम भय, कम अभिनय।”


जब मैंने तुलना का वस्त्र उतारा,
तो सहजता की त्वचा
पहली बार
स्वयं को स्पर्श कर सकी।


त्याग में एक अनोखी प्राप्ति है—
जैसे शोर हटे
और शून्य में
अपना ही स्वर सुनाई दे।


मैंने जाना,
सत्य का उदय
अर्जन से नहीं,
परित्याग से होता है।


जो मैं नहीं था,
वह धीरे-धीरे झरता गया—
और जो शेष बचा,
वह अपरिचित होकर भी अपना था।


अब यात्रा लक्ष्य की नहीं,
स्वयं तक लौटने की है—
जहाँ होना ही पर्याप्त है,
और होना ही पूर्णता।

. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
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