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शाश्वत भारत: जम्बू द्वीप से शाकद्वीप तक

शाश्वत भारत: जम्बू द्वीप से शाकद्वीप तक

सत्येन्द्र कुमार पाठक
खोज की आदि भूमि सदियों से भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक चेतना का केंद्र रहा है। प्राचीनकाल से ही यूनानी, रोमन और अरबी लोग यहाँ मिट्टी की खोज में नहीं, बल्कि उस 'सत्य' की खोज में आते रहे हैं जो आत्मा को तृप्त कर सके। हिन्दूकुश पर्वतमाला केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं थी, बल्कि दो संस्कृतियों का मिलन स्थल और ज्ञान का द्वार थी। अध्यात्म, चमत्कार और सिद्धियों के बारे में भारत की ख्याति ने इसे विश्व का गुरु बनाया। भारतीय धर्म और दर्शन दुनिया के अन्य मतों से बिल्कुल अलग हैं। यह किसी मरुस्थल की तरह शुष्क या नियमों से बंधा हुआ नहीं है, बल्कि यह हरे-भरे फलों से लदे एक सुव्यवस्थित जंगल की तरह है, जहाँ हर जीव को अपनी प्रकृति के अनुसार विकसित होने की स्वतंत्रता है।
पश्चिमी धर्म और दर्शन अक्सर 'रेडिमेड' उत्तर देते हैं। वहाँ सब कुछ निर्धारित है—ईश्वर एक है, उसका एक संदेशवाहक है, और जीवन केवल एक बार मिलता है। लेकिन भारतीय अध्यात्म प्रश्न को मारने के बजाय उसे जगाता है। : भारतीय दर्शन तब शुरू होता है जब हम आत्मा के स्वतंत्र अस्तित्व और पुनर्जन्म को मानते हैं। यहाँ ईश्वर के होने या न होने के संदेह से अधिक महत्व स्वयं को जानने का है।: उपनिषद् और गीता हमें यह नहीं बताते कि हमें क्या करना है, बल्कि यह सिखाते हैं कि हम 'कौन' हैं। जब हम दूसरों के बताए उत्तरों से मुक्त होते हैं, तभी सच्ची खोज शुरू होती है।
पश्चिमी धर्मों में प्रलय और न्याय (Judgment Day) की अवधारणा है, जबकि भारत में 'मोक्ष' यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति की प्रक्रिया है।
प्राचीनकाल से ही साधकों के लिए हिमालय सर्वोच्च शरणस्थली रहा है। मुण्डकोपनिषद् के अनुसार, हिमालय की वादियों में सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है जिसे 'देवात्मा हिमालय' कहा जाता है।
हिमालय क्षेत्र (जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, हिमाचल, उत्तराखंड, असम, अरुणाचल) के लोगों का स्वास्थ्य मैदानी इलाकों की तुलना में बेहतर होता है। यहाँ की शुद्ध वायु और आध्यात्मिक ऊर्जा दमा, टीबी, गठिया और नेत्र रोगों को दूर रखती है। तिब्बत के लोग आज भी निरोगी रहकर 100 वर्ष की औसत आयु प्राप्त करते हैं।
पश्चिमी ग्रंथों में स्वर्ग की कल्पना बर्फ और रेगिस्तान के लोगों की इच्छाओं जैसी है—जहाँ फल, सुंदर स्त्रियाँ और नदियाँ हों। भारत के लिए यह कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविकता है। कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल की स्थिति वैसी ही है जैसा कि प्राचीन ग्रंथों में स्वर्ग का वर्णन मिलता है। प्राचीन काल में यहीं ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्थान था और इंद्र का नंदनकानन वन भी यहीं स्थित था।
पौराणिक भूगोल—सप्तद्वीपा वसुंधरा का पुराणों के अनुसार पृथ्वी सात द्वीपों में विभाजित है। इनमें से जम्बू द्वीप और शाकद्वीप का संबंध अत्यंत गहरा है।
. जम्बू द्वीप: कर्म की भूमि हम जिस द्वीप के निवासी हैं, वह जम्बू द्वीप है। इसके मध्य में सुमेरु पर्वत है, जो ब्रह्मांड की धुरी माना जाता है। जम्बू द्वीप को नौ खंडों (वर्षों) में बाँटा गया है: इलावृत वर्ष: केंद्र का भाग जहाँ शिव का निवास है।
भारतवर्ष: सबसे महत्वपूर्ण खंड, जिसे 'कर्मभूमि' कहा गया है। यहाँ जन्म लेकर ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
किम्पुरुष वर्ष: जहाँ हनुमान जी आज भी राम की उपासना करते हैं।
शाकद्वीप: ज्ञान और शुद्धि का प्रतीक शाकद्वीप 'क्षीरसागर' (दूध के समुद्र) से घिरा है। यहाँ की संस्कृति अत्यंत शुद्ध और सात्विक मानी गई है। यहाँ के लोग वायु और सूर्य के माध्यम से ईश्वर की आराधना करते हैं। यहाँ क्रोध, ईर्ष्या और रोग का अस्तित्व नहीं है।
: शाकद्वीप के मग ब्राह्मण और भारत का संबंध इतिहास और पुराणों के अनुसार, शाकद्वीप और भारत (जम्बू द्वीप) का मिलन एक महान रोग के निवारण हेतु हुआ था। साम्ब की कथा और सूर्य उपासना भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हुआ। नारद मुनि के परामर्श पर उन्होंने शाकद्वीप से 18 परिवारों के 'मग' ब्राह्मणों को बुलवाया। ये ब्राह्मण सूर्य के अनन्य उपासक और आयुर्वेद के महापंडित थे। मग ब्राह्मणों की विरासत: ये विद्वान अपने साथ ज्योतिष (Astronomy) और सूर्य चिकित्सा का गूढ़ ज्ञान लाए। इन्होंने ही भारत में सूर्य की मूर्ति पूजा और भव्य सूर्य मंदिरों की नींव रखी। अव्यंग और पुर: ये ब्राह्मण आज भी अपने 72 'पुरों' (कुलों) और 'अव्यंग' (विशेष कमरबंद) के माध्यम से अपनी प्राचीन पहचान बनाए हुए हैं।
पूर्वी भारत का शाकद्वीपीय कॉरिडोर (बिहार, झारखंड, ओडिशा, नेपाल) शाकद्वीप से आए इन विद्वानों का मुख्य केंद्र पूर्वी भारत बना। आज भी यहाँ की संस्कृति में शाकद्वीपीय प्रभाव स्पष्ट दिखता है।
. बिहार और मगध 'मगध' शब्द की व्युत्पत्ति ही 'मग' ब्राह्मणों से मानी जाती है। छठ पूजा: बिहार का महापर्व छठ, शाकद्वीपीय सूर्य विज्ञान का जीवंत प्रमाण है। इसमें उगते सूर्य से पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, जो इस दर्शन को दर्शाता है कि अंत ही नए जीवन का बीज है। यह बिना किसी पुरोहित के किया जाने वाला वैज्ञानिक पर्व है।
ओडिशा और कोणार्क ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर न केवल स्थापत्य का नमूना है, बल्कि यह खगोलीय गणनाओं की प्रयोगशाला है। यहाँ की सूर्य प्रतिमाओं में पहने गए जूते (उदीच्य वेश) शाकद्वीप की भौगोलिक स्थिति की याद दिलाते हैं। नेपाल का ज्योतिष ज्ञान और झारखंड की औषधीय संपदा इसी ज्ञान परंपरा का हिस्सा है। बुद्ध का 'शाक्य' वंश भी इसी प्राचीन 'शाक' मूल से प्रेरित माना जाता है, जो ज्ञान और करुणा का केंद्र रहा।
सूर्य के 12 नाम और वैज्ञानिक चेतना शाकद्वीपीय संस्कृति ने हमें सूर्य के 12 रूपों का विज्ञान दिया। ये केवल नाम नहीं, बल्कि सौर ऊर्जा के विभिन्न स्तर हैं:
मित्र: मैत्रीपूर्ण ऊर्जा। रवि: ताप का स्रोत। सूर्य: प्रेरक शक्ति। भानु: प्रकाशक। खग: वायुमंडल का शुद्धिकर्ता।
पूषण: पोषक (फसलों के लिए)। हिरण्यगर्भ: ब्रह्मांडीय बीज। मरीचि: वाष्पीकरण का स्वामी। आदित्य: अमर ऊर्जा।
सवितृ: उत्पत्तिकर्ता। अर्क: औषधि का कारक। भास्कर: बुद्धि का प्रकाशक है।
: प्राचीन गुफाएँ और ऐतिहासिक धरोहर में भारत के भूगोल में केवल पहाड़ और नदियाँ नहीं, बल्कि इतिहास की परतें भी छिपी हैं। भीमबेटका: मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित 750 गुफाओं का समूह, जहाँ 35,000 वर्ष पुरानी चित्रकारी आज भी हमें आदिमानव की चेतना से जोड़ती है। अजंता-एलोरा और एलीफेंटा: ये गुफाएँ दर्शाती हैं कि कैसे पत्थरों को तराशकर अध्यात्म को ठोस रूप दिया गया। बामियान (अखंड भारत): अफगानिस्तान की गुफाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय दर्शन की सीमाएँ कितनी व्यापक थीं विश्व कल्याण का भारतीय मार्ग
भारत का अध्यात्म केवल व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण अस्तित्व के लिए है। यह हमें सिखाता है कि हम कौन हैं, क्यों हैं और हमारा इस ब्रह्मांड के साथ क्या संबंध है। जम्बू द्वीप की कर्मठता और शाकद्वीप की वैज्ञानिक सात्विकता का संगम ही आज के विश्व को शांति और स्वास्थ्य का मार्ग दिखा सकता है। हिमालय की वादियों से लेकर बिहार के छठ घाटों तक, और कोणार्क के पत्थरों से लेकर भीमबेटका की गुफाओं तक—भारत एक अखंड ग्रंथ है। इसे पढ़ने के लिए केवल आँखों की नहीं, बल्कि उस जिज्ञासा की आवश्यकता है जो हमें हमारे अपने कुओं से बाहर निकाल सके।
हमें एक ऐसे ज्ञान की जरूरत है जो यह न बताए कि क्या मानना है, बल्कि यह सिखाए कि कैसे जानना है। भारत की यह खोज शाश्वत है और हमेशा रहेगी।यह आलेख प्राचीन ग्रंथों, पौराणिक भूगोल और सांस्कृतिक विरासतों के गहन अध्ययन पर आधारित है।
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