कलेक्टर साहब और अंगूठा छाप सत्ता-प्रशासन की नई परिभाषा
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का नाम लेते ही एक तेजस्वी, विद्वान और निष्पक्ष अधिकारी की छवि उभरती है, जिसने कठिन परिश्रम और संघर्ष के बाद यह मुकाम हासिल किया है। लेकिन आज के दौर में यह छवि अक्सर एक अजीब विडंबना में बदलती दिखती है। एक ओर वर्षों की पढ़ाई, संविधान का गहरा ज्ञान और प्रशासनिक समझ रखने वाला अधिकारी, और दूसरी ओर एक ऐसा जनप्रतिनिधि, जिसकी योग्यता सिर्फ चुनाव जीतना भर है। परंतु सत्ता का समीकरण ऐसा है कि ज्ञान और नियम दोनों “नेता जी के आदेश” के सामने गौण हो जाते हैं।
स्थिति तब और व्यंग्यात्मक हो जाती है जब कलेक्टर साहब धीमे स्वर में कहते हैं—“सर, यह नियम के खिलाफ है,” और जवाब मिलता है—“नियम हम बनाते हैं।” इसके बाद फाइलें उसी दिशा में बढ़ती हैं, जहां सत्ता चाहती है। यहां प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि “जी सर” की गूंज ज्यादा प्रभावी हो जाती है।
यह केवल किसी एक अधिकारी की मजबूरी नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विडंबना है। एक IAS अधिकारी, जिसका दायित्व पारदर्शिता और कानून के अनुसार काम करना है, कई बार खुद को ऐसे मोड़ पर पाता है जहां उसे अपने आत्मसम्मान और पद के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। ट्रांसफर का भय, राजनीतिक दबाव और व्यवस्था में बने रहने की विवशता उसे “जी हुजूरी” की ओर धकेल देती है।
आज यदि इस हकीकत को देखें तो लगता है कि प्रशासनिक सेवाओं के पाठ्यक्रम में भी बदलाव की जरूरत है। शायद अब “नेता संतुष्टि प्रबंधन” और “आदेश पालन की कला” जैसे विषय भी शामिल करने पड़ें, क्योंकि जमीनी सच्चाई किताबों से काफी अलग है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह स्थिति शर्मिंदगी की है? उत्तर सरल नहीं है, क्योंकि यह किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की समस्या है। जब व्यवस्था ही इस तरह ढल जाती है, तो व्यक्ति के पास विकल्प सीमित रह जाते हैं।
फिर भी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आज भी कई ऐसे अधिकारी हैं जो दबाव के बावजूद ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का रास्ता चुनते हैं। वही इस लोकतंत्र की असली ताकत हैं।
अंततः सवाल हम सबके सामने है—क्या हम ऐसे जनप्रतिनिधियों को चुनते रहेंगे जिनके सामने एक योग्य अधिकारी को भी झुकना पड़े? या हम ऐसी व्यवस्था बनाएंगे जहां ज्ञान, ईमानदारी और योग्यता को उचित सम्मान मिले?क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के हाथ में ही होती है—और वही तय करती है कि “जी हुजूरी” चलेगी या “सुशासन”।
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