कलम के रिश्तें
संजय जैनमैं जो भी लिखता हूँ
उसे वो प्यार से गाती।
मेरी शब्दों में वो
चार चाँद लगा देती।।
मेरे लिखने का अंदाज
उसे पसंद आता है।
इसलिए वो मुझको यारों
बुलाती है मिलने को।।
मगर में जा नही पाया।
अभी तक उनसे मिलने को।
इरादा क्या वो रखते है
जिसे में समझ नही पाया।।
बड़ा ही विचित्र चित्रण है।
जिसे में लिख नही सकता।
पर शब्दों के भावों को।
लिखने से रोक नही सका।।
चलो करते है सेवा हम।
अपने परिवार वालों की।
जो दुख-सुख में साथ दे
वो ही सच्चा साथी है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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