संगम की रेती पर 'तपोलोक': श्रद्धा का महापर्व
सत्येन्द्र कुमार पाठक
जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड अपने चरम पर होती है और कोहरा गंगा की लहरों को गले लगाता है, तब प्रयागराज के संगम तट पर एक ऐसी नगरी बसती है, जिसका वर्णन पुराणों में 'स्वर्ग' के समान किया गया है। यह नगरी है—माघ मेला। यहाँ केवल तंबू नहीं गड़ते, बल्कि लाखों लोगों की आस्था का 'कायाकल्प' होता है। इस पूरी प्रक्रिया को हम 'कल्पवास' के नाम से जानते हैं। कल्पवास: समय की गणना और मोक्ष का द्वार का हिंदू धर्मग्रंथों में 'कल्प' को ब्रह्मा जी के एक दिन के बराबर माना गया है। माघ मास में प्रयागराज में वास करने को 'कल्पवास' इसलिए कहा जाता है क्योंकि मान्यता है कि यहाँ एक माह का संयमित निवास एक कल्प के बराबर पुण्य फल देता है। पौराणिक आख्यान कहते हैं कि जब सृष्टि का सृजन हुआ, तो ब्रह्मा जी ने यहीं अपना पहला अश्वमेध यज्ञ किया था। महाभारत के 'वन पर्व' में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा था— "हे कुन्तीपुत्र! जो व्यक्ति माघ मास में प्रयाग में रहकर अपनी इंद्रियों को वश में करता है, वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।"
. 'पर्णकुटी' की तपस्या: सादगी का चरम - कल्पवासी किसी आलीशान भवन में नहीं, बल्कि फूस की बनी 'पर्णकुटी' में रहते हैं। यह झोपड़ी सरकंडे और पुआल से बनाई जाती है।: पुआल ऊष्मा का कुचालक होता है, जो बाहर की भीषण ठंड को भीतर आने से रोकता है और जमीन की गर्मी को बचाए रखता है। आध्यात्मिक संदेश: यह कुटिया मनुष्य को याद दिलाती है कि अंत में सब कुछ इसी मिट्टी में मिल जाना है। यहाँ अमीर और गरीब के बीच की दीवार गिर जाती है। एक अरबपति भी उसी टाट की बोरी पर सोता है जिस पर एक साधारण ग्रामीण सोते हैं।
कल्पवास कोई धार्मिक पर्यटन नहीं, बल्कि एक 'कठिन व्रत' है। एक कल्पवासी का दिन ब्रह्म मुहूर्त (तड़के 4 बजे) में गंगा स्नान से शुरू होता है। त्रिकाल स्नान: सुबह, दोपहर और शाम—तीन बार ठिठुरते जल में स्नान करना शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति देता है। कल्पवासी दिन भर में केवल एक बार स्वयं का बनाया सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। पूरे दिन भजन-कीर्तन, रामायण पाठ और संतों के प्रवचन सुनना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। वे सांसारिक विवादों से दूर रहकर 'मौन' का पालन करते हैं।
स्नानों का राजा: मौनी अमावस्या और अमृत योग में माघ मेले के केंद्र में वे विशिष्ट तिथियां हैं, जिनका खगोलीय महत्व है। मकर संक्रांति पर जब सूर्य उत्तरायण होते हैं, तो देवताओं का दिन शुरू होता है। मौनी अमावस्या के दिन तो संगम का जनसागर देखते ही बनता है। लोक कथा है कि इस दिन समुद्र मंथन से निकला अमृत संगम के जल में घुल जाता है। इस दिन मौन रहकर स्नान करने से अंतरात्मा की आवाज सुनाई देने लगती है। माघी पूर्णिमा पर कल्पवास की पूर्णाहुति होती है, जहाँ कल्पवासी नम आँखों से गंगा मैया से विदा लेते हैं। माघ मेले का एक और आकर्षण है—अखाड़े। यहाँ नागा साधुओं का तप, भभूत से सना उनका शरीर और 'हर-हर महादेव' के जयघोष वातावरण को अलौकिक बना देते हैं। ये अखाड़े सनातन धर्म की रक्षा के प्रतीक हैं, जहाँ शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दी जाती है। कल्पवास का समापन 'दान' के बिना अधूरा है। 'शैया दान' (बिस्तर का दान), अन्न दान और गौ-दान की परंपरा यहाँ सदियों से चली आ रही है। यह दान इस भाव से किया जाता है कि हमने जो कुछ समाज से लिया, वह उसे लौटा दें।
प्रयागराज का कल्पवास हमें सिखाता है कि "सुख वस्तुओं के संचय में नहीं, बल्कि मन के संयम में है।" कड़ाके की ठंड, मामूली भोजन और जमीन पर शयन के बावजूद कल्पवासियों के चेहरों पर जो मुस्कान होती है, वह आधुनिक दुनिया के तनावपूर्ण जीवन के लिए एक औषधि है। यह भारतीय संस्कृति की वह जीवंत तस्वीर है, जो हजारों वर्षों से बिना रुके, बिना थके निरंतर चली आ रही है।
तीर्थराज प्रयाग : कल्पवास की कालजयी यात्रा
सत्येन्द्र कुमार पाठक
प्रयागराज की पावन धरती पर माघ मास में आयोजित होने वाला 'कल्पवास' केवल एक धार्मिक मेला नहीं है, बल्कि यह भारत की पाँच हजार वर्षों से अधिक पुरानी जीवंत सभ्यता का दस्तावेज़ है। इतिहास केवल राजाओं के युद्धों और समझौतों का नाम नहीं है, बल्कि उन परंपराओं का भी नाम है जो हज़ारों सालों से अटूट बनी हुई हैं। प्रयागराज का कल्पवास विश्व के सबसे पुराने निरंतर चलने वाले सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। कल्पवास का सबसे प्राचीन संदर्भ ऋग्वेद के परिशिष्ट भाग में मिलता है, जहाँ 'सितासित' (श्वेत और श्याम यानी गंगा-यमुना) के संगम का वर्णन है। पुराणों के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी ने यहाँ 'प्रकृष्ट यज्ञ' किया था, जिससे इसका नाम 'प्रयाग' पड़ा। मगध सम्राट अशोक और उनके बाद के शासकों के शिलालेखों में भी प्रयाग की महत्ता का संकेत मिलता है। प्रयाग का 'अक्षयवट' कल्पवास की प्राचीनता का मूक गवाह रहा है, जिसके नीचे बैठकर हज़ारों वर्षों से ऋषि-मुनि तपस्या करते आए हैं।त्रेतायुग और द्वापरयुग का साक्ष्य में कल्पवास को महाकाव्य काल से जोड़कर देखते हैं: । त्रेतायुग में : वनवास के दौरान भगवान श्रीराम का महर्षि भारद्वाज आश्रम (प्रयाग) में आगमन और वहाँ के आध्यात्मिक अनुशासन का वर्णन मिलता है। महर्षि भारद्वाज को उस समय के 'प्रयाग विश्वविद्यालय' का कुलपति माना जाता था, जहाँ हज़ारों विद्यार्थी और साधक कल्पवास जैसी साधना करते थे। द्वापरयुग में : महाभारत के 'अनुशासन पर्व' में भीष्म पितामह ने माघ मास में प्रयाग निवास को तपस्या का उच्चतम शिखर बताया है। यह सिद्ध करता है कि द्वापर युग में भी कल्पवास की सुव्यवस्थित परंपरा विद्यमान थी।
. विदेशी यात्रियों की आँखों से प्रयाग (7वीं सदी) में कल्पवास के सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत में मिलते हैं, जो सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल (644 ईस्वी) में प्रयाग आए थे। ह्वेनसांग ने लिखा है कि संगम के रेतीले मैदान पर लाखों लोग महीनों तक तपस्या करते थे। उन्होंने सम्राट हर्षवर्धन के 'महामोक्ष परिषद' का वर्णन किया है, जहाँ राजा अपना सब कुछ (राजकीय वस्त्रों तक) दान कर देते थे और कल्पवासियों की सेवा करते थे। यह दुनिया का सबसे बड़ा ऐतिहासिक दान उत्सव था मध्यकाल में भी कल्पवास की निरंतरता बनी रही। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा:है। "माघ मकर गति रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥" यह दर्शाता है कि 16वीं शताब्दी में भी देश के कोने-कोने से लोग यहाँ कल्पवास के लिए आते थे। अकबर के शासनकाल में जब 'इलाहाबाद' किले का निर्माण हुआ, तब भी कल्पवास की भौगोलिक सीमाएं और धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित रही। . ब्रिटिश काल के शासनकाल में माघ मेले और कल्पवास पर कर (Pilgrim Tax) लगाने की कोशिश की गई, जिसका भारी विरोध हुआ। ब्रिटिश गजेटियर्स में प्रयाग के कल्पवास को "दुनिया का सबसे अनुशासित अस्थायी मानव जमावड़ा" कहा गया है। उस दौर में रेलमार्ग विकसित होने से कल्पवासियों की संख्या लाखों से करोड़ों में पहुँच गई।कल्पवास का 'अध्यात्म-शास्वत ऐतिहासिक रूप से कल्पवास के तीन मुख्य स्तंभ रहे हैं:। कायाकल्प शरीर को उपवास और पवित्र जल से शुद्ध करना। मध्यकाल में यह ज्ञान के आदान-प्रदान का सबसे बड़ा केंद्र था। इतिहास गवाह है कि यहाँ अछूतोद्धार और सामाजिक एकता के बड़े आंदोलन हुए है। एक शाश्वत विरासत आज जब हम 2026 के प्रयागराज को देखते हैं, तो पाते हैं कि तकनीक बदल गई है—अब टेंटों में बिजली है, सड़कों पर कंक्रीट है, लेकिन कल्पवासी की आत्मा वही है। वह आज भी उसी श्रद्धा से गंगा की गोद में अपनी कुटिया बनाता है जैसे हज़ारों साल पहले उसके पूर्वज बनाते थे। कल्पवास भारतीय इतिहास की वह कड़ी है जो हमें यह याद दिलाती है कि हमारी संस्कृति 'भोग' की नहीं, बल्कि 'योग' और 'त्याग' की है। यह विश्व को भारत का संदेश है कि शांति हथियारों से नहीं, बल्कि आत्म-संयम से प्राप्त होती है।
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