पहेलियों का महासफर: वैदिक प्रहेलिका से आधुनिक तक
सत्येन्द्र कुमार पाठक
पहेलियाँ केवल शब्दों का मायाजाल या मनोरंजन का साधन मात्र नहीं हैं, बल्कि ये मानव सभ्यता के बौद्धिक विकास की जीवंत गवाह हैं। 'पहेली' शब्द का अर्थ ही है—बुद्धि को चुनौती देना। भारत की प्राचीन गलियों से लेकर यूरोप के आधुनिक कारखानों तक, पहेलियों ने शिक्षा, मनोरंजन और कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पहेलियों का आध्यात्मिक और बौद्धिक उद्भव भारतीय इतिहास में पहेलियों का अस्तित्व उतना ही पुराना है जितना कि हमारी भाषा। प्राचीन काल में इसे 'प्रहेलिका' कहा जाता था। पहेलियों का सबसे प्राचीन संदर्भ ऋग्वेद में मिलता है। वेदों में पहेलियों का उपयोग ब्रह्मांड के रहस्यों को समझाने के लिए किया जाता था। उपनिषदों में ऋषि-मुनि अपने शिष्यों की एकाग्रता और तर्कशक्ति की परीक्षा लेने के लिए जटिल दार्शनिक प्रश्न पहेलियों के रूप में पूछते थे। इसे 'ब्रह्मोदय' कहा जाता था, जहाँ सभाओं में विद्वान एक-दूसरे को पहेलियों के माध्यम से चुनौती देते थे। संस्कृत के महाकाव्यों में रामायण और महाभारत—में भी पहेलियों के प्रसंग मिलते हैं। महाभारत में 'यक्ष-युधिष्ठिर संवाद' पहेलियों का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ यक्ष द्वारा पूछे गए गूढ़ प्रश्नों का उत्तर युधिष्ठिर ने अपनी बुद्धिमत्ता से दिया था। संस्कृत के महान कवि दंडी और बाणभट्ट ने अपने काव्यों में 'चित्रकाव्य' और 'कूटश्लोक' के माध्यम से पहेलियों को कलात्मक रूप प्रदान किया। पहेलियों का लोकतंत्रीकरण और अमीर खुसरो 13वीं और 14वीं शताब्दी के दौरान पहेलियों ने एक नया मोड़ लिया। अब ये केवल राजदरबारों या विद्वानों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि आम जनता की भाषा बन गईं।। महान सूफी संत और कवि अमीर खुसरो ने पहेलियों को जन-जन तक पहुँचाया। उन्होंने 'हिंदवी' (खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप) में पहेलियाँ और 'मुकरियाँ' लिखीं। खुसरो की पहेलियाँ सरल वस्तुओं जैसे—दीपक, नाखून, ढोल और रोटी पर आधारित थीं, जो बच्चों और बड़ों दोनों को समान रूप से आकर्षित करती थीं।
संतों की वाणी और नैतिक शिक्षा में कबीर, तुलसीदास और रहीम जैसे संतों ने 'उलटबाँसियों' का प्रयोग किया। ये ऐसी पहेलियाँ थीं जो सुनने में अजीब लगती थीं लेकिन उनके पीछे गहरा नैतिक और आध्यात्मिक अर्थ छिपा होता था। उदाहरण के लिए, कबीर की पहेलियाँ अक्सर समाज की विसंगतियों पर प्रहार करती थीं और बच्चों को तर्क करना सिखाती थीं। जिग-सॉ पहेली का जन्म और विकास जहाँ भारत में पहेलियाँ मौखिक और शाब्दिक रूप में विकसित हो रही थीं, वहीं 18वीं सदी के यूरोप में एक नई क्रांति हुई जिसने पहेलियों को एक भौतिक स्वरूप दिया।
1766 में लंदन के एक मानचित्रकार जॉन स्पिल्सबरी ने भूगोल पढ़ाने का एक अभिनव तरीका खोजा। उन्होंने लकड़ी के बोर्ड पर दुनिया का नक्शा चिपकाया और देशों की सीमाओं के साथ उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट दिया। इसे 'डिसेक्टेड मैप्स' कहा गया। यह दुनिया की पहली जिग-सॉ पहेली (Jigsaw Puzzle) थी। इसका उद्देश्य बच्चों को खेल-खेल में भूगोल सिखाना था।: बड़े पैमाने पर उत्पादन और महामंदी 1900 के आसपास पहेलियाँ वयस्कों के बीच भी लोकप्रिय होने लगीं। 1908 में पार्कर ब्रदर्स जैसी कंपनियों ने लकड़ी की जगह कार्डबोर्ड का उपयोग शुरू किया, जिससे इनका उत्पादन सस्ता हो गया। 1930 के दशक की 'महान मंदी' (Great Depression) के दौरान, जिग-सॉ पहेलियों की मांग चरम पर पहुँच गई। क्योंकि लोग महंगे मनोरंजन (जैसे सिनेमा) नहीं कर सकते थे, इसलिए वे घंटों तक घर बैठकर पहेलियाँ सुलझाना पसंद करते थे। यह तनाव कम करने का एक जरिया बन गया है । आज 21वीं सदी में बाल पहेलियाँ अपने सबसे विकसित रूप में हैं। इन्हें अब चार मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। आधुनिक पहेलियाँ अब बच्चों के पसंदीदा सुपरहीरो (जैसे आयरन मैन, स्पाइडर-मैन), जानवरों और नर्सरी कविताओं पर आधारित होती हैं। सुडोकू और पहेली-बॉक्स (Puzzle Boxes) बच्चों की गणितीय क्षमता को बढ़ाते हैं । मोबाइल एप्स और ऑनलाइन वर्कशीट्स ने पहेलियों को इंटरैक्टिव बना दिया है, जहाँ एनिमेशन और साउंड का उपयोग होता है। आधुनिक स्टेम शिक्षा में विज्ञान के सिद्धांतों को समझाने के लिए पहेलीनुमा प्रयोगों का सहारा लिया जाता है।।मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, पहेलियाँ बच्चों के मस्तिष्क के लिए 'सुपरफूड' हैं। इनके कई लाभ हैं: पहेलियाँ सुलझाते समय बच्चा विश्लेषण करना, पैटर्न पहचानना और निष्कर्ष निकालना सीखता है। जिग-सॉ के छोटे टुकड़ों को पकड़ना और उन्हें सही जगह फिट करना बच्चों की उंगलियों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। जब बच्चा एक जटिल पहेली को सुलझा लेता है, तो उसके भीतर 'डोपामाइन' (खुशी का हार्मोन) रिलीज होता है, जिससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। सामाजिक कौशल: समूह में पहेली सुलझाने से बच्चों में टीम वर्क और सहयोग की भावना विकसित होती है।
पहेलियों का इतिहास मानव जिज्ञासा का इतिहास है। प्राचीन वेदों की 'प्रहेलिका' से लेकर अमीर खुसरो की 'मुकरियों' और स्पिल्सबरी के 'नक्शों' तक, पहेलियों ने हमेशा हमें यह सिखाया है कि समस्या कितनी भी जटिल क्यों न हो, उसका समाधान हमारे पास ही है। आज पहेलियाँ शिक्षा का एक अनिवार्य अंग बन चुकी हैं, जो बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उनके भविष्य की बौद्धिक नींव रख रही हैं।
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