"अब भी उजाला बाकी है"
पंकज शर्माहृदय के इस गहन तहख़ाने में
कुछ ऐसा है
जो शांत नहीं होना चाहता।
समय ऊपर से गुजरता रहता है,
पर भीतर
पीड़ा अपनी ही धड़कन सुनती है।
कुछ घाव
भरने का अभिनय करते हैं,
पर स्मृति की हल्की-सी ठोकर से
फिर जाग उठते हैं।
वे रक्त नहीं माँगते,
वे स्वीकार चाहते हैं।
मन अब भी
किसी सुबह की प्रतीक्षा में है—
ऐसी सुबह
जो केवल उजली न हो,
जो भीतर के अंधकार को
नाम दे सके।
आँखों में
बहुत कुछ ठहरा हुआ है—
न आँसू,
न शब्द।
जैसे किसी अथाह जल में
लहरें थककर
चुप हो गई हों।
यह प्रतीक्षा
कमज़ोरी नहीं है,
यह विश्वास का दूसरा नाम है।
अंधकार में
जो मनुष्य रुक सकता है,
वही
प्रकाश को पहचानता है।
इसलिए
यदि हृदय भारी है,
तो उसे दोष मत दो।
शायद वह
आज भी
जीवन से
पूरा होने की
आख़िरी उम्मीद
छिपाए बैठा है।
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✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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