बराबर की गुफाएँ, जहाँ पत्थर भी शीशे की तरह बोलते हैं
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारत की भूमि केवल मिट्टी और पत्थरों का विस्तार नहीं है; यह उन कहानियों की परतों से बनी है जो समय के साथ गहरी होती गई हैं। बिहार के जहानाबाद जिले में स्थित बराबर पर्वत समूह एक ऐसा ही रहस्यमयी अध्याय है। जिसे इतिहासकारों ने 'मगध का हिमालय' कहा, वह आज भी अपनी 2300 साल पुरानी चमक और आध्यात्मिक ऊर्जा से दुनिया को चकित कर रहा है। यह स्थल केवल पर्यटन केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय इंजीनियरिंग और धार्मिक सहिष्णुता का वह पहला शिलालेख है, जिसने आने वाली सदियों के लिए पत्थर पर कला उकेरने का रास्ता खोलबराबर पर्वत का उल्लेख इतिहास से कहीं पहले पुराणों और महाकाव्यों में मिलता है। महाभारत के 'वन पर्व' के अनुसार, यह क्षेत्र असुर राजा बाणासुर की राजधानी था। स्थानीय लोग आज भी इसे 'वाणावर' पुकारते हैं, जो 'बाणासुर' शब्द का ही अपभ्रंश है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी पर्वत की गुफाओं में लोमष ऋषि ने कठोर तपस्या की थी। स्कंद पुराण कहता कि भगवान शिव ने उन्हें अमरता का वरदान दिया था। इसी भूमि पर लोमष ऋषि ने काकभुसुंडि को रामकथा सुनाई थी। बराबर की गुफाओं के शांत गलियारे आज भी उस प्राचीन जप और तप की प्रतिध्वनि महसूस कराते ह
इतिहास के पन्नों को पलटें तो बराबर की गुफाएँ मौर्य साम्राज्य के सुनहरे दौर की याद दिलाती हैं। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में जब सम्राट अशोक ने 'धम्म' को अपनाया, तो उन्होंने एक ऐसी मिसाल कायम की जो आज के लोकतंत्र के लिए भी सीख है।
अशोक ने इन गुफाओं का निर्माण 'आजीवक संप्रदाय' के भिक्षुओं के लिए करवाया था। आजीवक, जो नियतिवाद (Destiny) में विश्वास रखते थे, बौद्ध और जैन धर्मों के समकालीन थे। एक बौद्ध सम्राट द्वारा दूसरे संप्रदाय के लिए ऐसी भव्य गुफाएँ बनवाना यह दर्शाता है कि प्राचीन भारत में वैचारिक मतभेदों के बावजूद धार्मिक सौहार्द चरम पर था। अशोक के पौत्र दशरथ मौर्य ने भी इस परंपरा को जारी रखा और पास की नागार्जुन पहाड़ी पर गुफाओं का निर्माण कर । बराबर की गुफाओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी 'मौर्यकालीन पॉलिश' है। अगर आप गुफा के भीतर प्रवेश करें और अपनी उंगलियों को दीवारों पर फेरें, तो आपको पत्थर नहीं, बल्कि मखमली चिकनाई महसूस होगी।
ग्रेनाइट का अनुशासन: ग्रेनाइट दुनिया के सबसे कठोर पत्थरों में से एक है। आज की मशीनों के बिना उस दौर के शिल्पकारों ने इसे काटकर बिल्कुल सीधी दीवारें कैसे बनाईं, यह आज भी सिविल इंजीनियरों के लिए पहेली है।
दर्पण जैसी चमक: गुफा के अंदर की पॉलिश इतनी सघन है कि अंधेरे में एक छोटी सी मोमबत्ती जलाने पर भी पूरी गुफा कांच के महल की तरह चमक उठती है। 2300 साल बीत जाने के बाद भी इस पॉलिश की चमक वैसी ही है, मानो इसे कल ही बनाया गया हो।
ध्वनि विज्ञान गुफाओं के भीतर ध्वनि का विज्ञान (Acoustics) अद्भुत है। यहाँ किया गया एक हल्का सा उच्चारण भी कई बार गूँजता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसे विशेष रूप से ध्यान और 'ओम्' जैसे बीज मंत्रों के नाद के लिए डिजाइन किया गया था।. लोमष ऋषि गुफा: पत्थर पर लकड़ी का भ्रम समूह की सबसे प्रसिद्ध गुफा लोमष ऋषि गुफा है। इसका प्रवेश द्वार भारतीय वास्तुकला के इतिहास में एक 'क्रांतिकारी' बिंदु है। द्वार को 'चैत्य मेहराब' शैली में बनाया गया है। पत्थर पर की गई नक्काशी ऐसी है जैसे किसी कुशल बढ़ई ने लकड़ी पर काम किया हो। मेहराब के ऊपर हाथियों का एक झुंड उकेरा गया है जो स्तूप की ओर बढ़ रहा है। यह कलाकृति दर्शाती है कि मौर्यकालीन कलाकार प्रकृति और जीव-जंतुओं के कितने करीब गुफाओं की दीवारों पर उकेरे गए ब्राह्मी लिपि के शिलालेख हमें सटीक समय और उद्देश्य की जानकारी देते हैं। सुदामा गुफा में अशोक के शासनकाल के 12वें वर्ष का शिलालेख है। कर्ण चौपर में उनके 19वें वर्ष का लेख मिलता है।इन लेखों में राजा खुद को 'देवानांप्रिय' (देवताओं का प्रिय) कहते हैं। ये शिलालेख न केवल लिपि के विकास को दर्शाते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि उस समय राजकीय घोषणाएँ पत्थरों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाई जाती थीं। सिद्धेश्वर नाथ: आस्था का अटूट जहाँ गुफाएँ इतिहास और वास्तुकला की बात करती हैं, वहीं पर्वत के शिखर पर स्थित सिद्धेश्वर नाथ मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इसे 'सिद्धनाथ' भी कहा जाता है। सावन के महीने में यहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु 'पाताल गंगा' से जल लेकर पहाड़ की दुर्गम चढ़ाई करते हैं। यहाँ का शिवलिंग अत्यंत प्राचीन माना जाता है, जिसे सिद्ध संप्रदाय के योगियों ने अपनी साधना से जागृत किया था।
बराबर को 'मगध का हिमालय' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह क्षेत्र अपनी ऊँचाई और प्राकृतिक शांति के कारण हिमालय जैसा अनुभव देता है। बिहार सरकार ने यहाँ 'वाणावर महोत्सव' के माध्यम से पर्यटन को नई दिशा दी है, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। संरक्षण की आवश्यकता: आज इन गुफाओं को 'यूनेस्को विश्व धरोहर' में शामिल करने की मांग उठ रही है। हवा और नमी के कारण कुछ स्थानों पर पत्थर की परतों में कटाव देखा गया है। साथ ही, पर्यटकों की लापरवाही से शिलालेखों को नुकसान पहुँचने का डर रहता है। इस राष्ट्रीय विरासत को बचाने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक संरक्षण की आवश्यकता है। पर्यटकों के लिए एक स्वर्ग की गुफाओं की शांति आपको मौर्य काल में ले जाएगी। यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं, तो यहाँ की पहाड़ियाँ और सूर्यास्त का दृश्य आपको मंत्रमुग्ध कर देगा। और यदि आप एक साधक हैं, तो इन गुफाओं की प्रतिध्वनि आपके भीतर के शून्य को भर देगी।
बराबर की गुफाएँ पत्थर की निर्जीव संरचनाएँ नहीं हैं; वे भारत के उस गौरवशाली अतीत की गूँज हैं जहाँ विज्ञान और आध्यात्मिकता का हाथ मिलाना संभव था। यह स्थल हमें याद दिलाता है कि भारत ने दुनिया को केवल 'शून्य' ही नहीं दिया, बल्कि पत्थरों को दर्पण बनाने की कला भी सिखाई। आज जरूरत है कि हम अपनी इस विस्मृत विरासत की ओर लौटें, उसे देखें और गर्व के साथ आने वाली पीढ़ियों को सौंपें।
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