"जीवन-पतंग और संयम का सूत्र"
पंकज शर्मा
मनुष्य का जीवन उस आकाशगामी पतंग के सदृश है, जिसकी ऊँचाई एवं स्थिरता 'संयम' रूपी अदृश्य डोर पर टिकी है। जब तक विवेक की यह डोर दृढ़ रहती है, मन रूपी पतंग अनंत आकाश की ऊँचाइयों को गरिमा के साथ स्पर्श करती है। संयम ही वह अनुशासन है जो हमें प्रतिकूल परिस्थितियों की तीव्र वायु में भी संतुलित बनाए रखता है एवं हमारे अस्तित्व को एक निश्चित दिशा प्रदान करता है।
किंतु, जैसे ही वासनाओं के वेग से संयम का यह सूत्र छिन्न-भिन्न होता है, मन लक्ष्यहीन होकर सांसारिक इच्छाओं के झंझावातों में भटकने लगता है। डोर से कटी पतंग की भाँति, दिशाहीन अंतर्मन पतन के गर्त में गिरकर अपनी सार्थकता खो देता है। अतः, जीवन की सार्थकता ऊँची उड़ान में नहीं, अपितु संयम के साथ स्वयं को बांधे रखने की कला में निहित है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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