सावित्रीबाई फुले
(नारी चेतना की मशाल)✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
अंधेरों में दीप जली,
कलम बनी थी उसकी ढाल।
कंधे पर जब बस्ता रखा,
कांटों से भरा था हर इक चाल।
गालियाँ, पत्थर, अपमान सहा,
फिर भी पथ से न डिगी पगडंडी।
ज्ञान की गंगा बहा गई,
बनी समाज की नई पहचान बड़ी।
जहाँ बेटियाँ बोझ कही जाती थीं,
वहाँ उसने सपने बोना सिखलाया।
अक्षर-अक्षर जोड़ के उसने
नारी को उसका हक दिलवाया।
सावित्री थी केवल नारी नहीं,
वह क्रांति का उद्घोष बनी।
फूले के संग चलकर उसने
इतिहास की धारा मोड़ दी।
आज भी जब कलम उठती है,
जब बेटी स्कूल जाती है,
हर उस रोशनी के पीछे
सावित्रीबाई मुस्काती है।
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