नहीं रहे साहित्य सम्मेलन के सबसे पुराने वयोवृद्ध कर्मी महेश प्रसाद

- निधन पर सम्मेलन में शोक व्याप्त
पटना, १३ जनवरी। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में वर्ष 1975 से सेवा दे रहे सम्मेलन के सबसे पुराने और समर्पित 90 वर्षीय कर्मी महेश प्रसाद नहीं रहे । मंगलवार की संध्या चार बजे, उन्होंने सम्मेलन-परिसर स्थित अपने आवास पर अपनी अंतिम साँस ली । वे विगत डेढ़ महीने से बीमार थे। उन्हें साँस लेने में कठिनाई हो रही थी।
सूचना मिलते ही सम्मेलन अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ अपने पदाधिकारियों कुमार अनुपम, कृष्ण रंजन सिंह तथा नन्दन कुमार मीत के साथ पहुँच कर उनका अंतिम दर्शन किया और पुष्पांजलि अर्पित की। अपने शोकोदगार में डा सुलभ ने कहा कि महेश जी सम्मेलन के सर्वाधिक विश्वस्त और समर्पित सेवी थे। उनकी आत्मा सम्मेलन में बसती थी । उनके जैसे समर्पित लोग अब नहीं होते। उनकी कमी की भरपाई कभी नहीं हो सकती । इस आयु में भी वे सम्मेलन का कार्य करते थे। सम्मेलन भवन की चाभियाँ उन्हीं के पास रहा करती रही है।
बुधवार को उनका अग्नि-संस्कार गुल्बी घाट पर संपन्न होगा । इसके पूर्व उनके अंतिम दर्शन के लिए उनका पार्थिव शरीर सम्मेलन-सभागार में पूर्वाह्न 9 बजे रखा जाएगा।
शोक प्रकट करने वालों में सम्मेलन के उपाध्यक्ष जिया लाल आर्य, उपेन्द्रनाथ पाण्डेय , डा शंकर प्रसाद, डा मधु वर्मा, डा कल्याणी कुसुम सिंह, सम्मेलन के प्रधानमंत्री डा शिववंश पाण्डेय, अर्थ मंत्री कुमार अनुपम, प्रबंधमंत्री कृष्ण रंजन सिंह, साहित्यमंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी, लोकभाषा मंत्री डा पुष्पा जमुआर, प्रचारमंत्री विभा रानी श्रीवास्तव, संगठन मंत्री डा शालिनी पाण्डेय, पुस्तकालय मंत्री अशोक कुमार, कलामंत्री डा पल्लवी विश्वास, आरपी घायल, बच्चा ठाकुर, डा पूनम आनंद, श्याम बिहारी प्रभाकर, आचार्य विजय गुंजन, प्रवीर पंकज, आराधना प्रसाद, बांके बिहारी साव, डा नागेश्वर प्रसाद यादव, डा सुमेधा पाठक, शमा कौसर “शमा”, डा अर्चना त्रिपाठी, चंदा मिश्र, डा अमरनाथ प्रसाद,डा मनोज गोवर्धनपुरी, सागरिका राय, जय प्रकाश पुजारी, डा मीना कुमारी परिहार, सिद्धेश्वर, नन्दन कुमार मीत, रूबी झा, मेनका कुमारी, डॉली कुमारी, वीरेन्द्र प्रसाद, उमेश कुमार, सुनीता देवी और राजाराम के नाम सम्मिलित हैं।
अपने पीछे वे एक मात्र पुत्र कृष्ण मोहन प्रसाद , पुत्रवधू पुष्पा देवी, पुत्री रंजू देवी, पौत्र प्रेम श्रीवास्तव , पौत्रियाँ शिखा श्रीवास्तव, दामिनी कुमारी तथा वर्षा कुमारी भारती को शोक-संतप्त छोड़ गए हैं ।
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