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मिले मन हमारा - तुम्हारा।

मिले मन हमारा - तुम्हारा।

डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी
ग्रीनलेवल चाय का कप हाथ में थामते ही एक सपना आया ,
राष्ट्रवादी होने का अर्थ मानस पटल पर छाया ।
यही तो है वह चाय -
जिसे वर्धा मे सुब्बाराव पीते हैं-
चेन्नई में चेनम्मा पीती हैं -
कोलकाता में कालीचरण चटोपाध्याय पीते हैं -
शिमला मैं सुन्दरलाल और राजस्थान में राणा पीते हैं ।
हनसब अपने देश के लिए एकही ब्रांड की चाय पीते हैं -
मिले कप हमारा तुम्हारा ।
बिग बाजार में ऊपर सिढ़ियों से चलते हुए-
कोने में पड़ी एक थुकदानी दिखी ।
मैं ने थूका -
उसने थूका -
इसने थूका -
और लोगों ने थूका -
सबने थूका ।
हमसब एकसाथ देश के लिए थूकते हैं -
मिले थूक हमारा तुम्हारा ।
गुरुजी राष्ट्र का निर्माण करते हैं -
वे राष्ष्ट्र -निर्माता कहे जाते हैं ।
उनका ज्ञान खगोल से भूगोल पर तब उतर आया -
जब उन्होने बच्चों को यह ज्ञानपरिमार्जित पाठ पढ़ाया -
ग्रहण तीन प्रकार के होते हैं -
सुर्यग्रहण , चन्द्रग्रहाण और पाणिग्रहण।
हमसब देश केलिए ग्रहण पढते और पढ़ाते हैं -
मिले ज्ञान हमारा - तुम्हारा ।
हमसब भारत के वासी हैं ।
यहाँ कोई गेंद खेलता है -
कोई जूआ खेलता है -
कोई नीतिगत खेल खेलता है -
कोई राजनीति का खेल खेलता है -
इसीलिए यहाँ विविधता में एकता है -
हमसब देश के लिए खेलते हैं ।
मिले खेल हमारा - तुम्हारा ।
"आया हूँ मैं गीत बेचता" मेरी एक रचना है ।
बेचना एक कला है ।
कोई गीत बेचता है -
कोई अखबार बेचता है -
कोई आज बेचता है कोई आजऔर कल बेचता है -
कोई जागरण और सांध्य बेचता है -
कोई भूवन और भास्कर तो कोई हिन्दुस्तान बेचता है ।
हम सब देश के लिए एकसाथ सभी आइटम बेचते हैं -
मिले आइटम हमारा - तुम्हारा ।डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी
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